BharatKosha
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

by माधवकर

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

DevanagariSanskritpublished404 pages

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भाषाटीकासमेत । ( १९५ ) कुछ दाहयुक्त ऐसी होय है । ३ जालनी-ये तीव्र दाहकरके संयुक्त और मांसके जालसे व्याप्त होय है । ४ विनता-ये फुन्सी पीठमें अथवा पेटमें होय है इसकी पीडा बहुत होय, ठंडी होय तथा बडी और नीले रंगकी होय है । ५ अलजी-लाल काली बारीक फोडोंकरके व्याप्त भयंकर होय है। ६ मसूरिका-मसूरकी दालके समान बडी होय है। ७ सर्षपिका-सफेद सरसोंके समान बडी होय है। ८ पुत्रिणी-ये बीचमें एक बडी फुन्सी होय उसके चारों ओर छोटी २ फुन्सी और होय उसको पुत्रिणी कहते हैं । ९ विदारिका-यह विदारीकंदके समान गोल और करडी होय है । १० विद्रधिका-यह विद्रधिके लक्षण करके युक्त होय है । भोज और सुश्रुतके मतसे नौ पिडिका हैं और चरकके मतसे सात ही हैं ॥ पिटिकाकी उत्पत्ति । ये यन्मयाः स्मृता मेहास्तेषामेतास्तु तन्मयाः ॥ ८ ॥ विना प्रमेहमप्येता जायन्ते दुष्टमेदसः । तावच्चैता न लक्ष्यन्ते यावद्वास्तुपरिग्रहः ॥ ९ ॥ जो प्रमेह जिस दोषकरके उल्बण होय है तिसकरके तिसी दोषके उल्बणकरके पिटिका होती है। ये पिटिका प्रमेहके विना दुष्ट मेदके होनेसे भी प्रगट होती है। जब- तक इनकी गांठ नहीं बन्धे तबतक नहीं दीखें । 'ये यन्मयाः स्मृता मेहाः' इस पदके ऊपर मधुकोशवालेने शास्त्रार्थ लिखा है, ग्रन्थ बढनेके भयसे हमने नहीं लिखा ॥ असाध्यपिटिकाके लक्षण । गुदे हृदि शिरस्यंसे पृष्ठे मर्मसु चोत्थिताः । सोपद्रवा दुर्बलाग्नेः पिडिकाः परिवर्जयेत् ॥ १० ॥ गुदामें हृदयमें शिरमें कन्धेमें पीठमें और मर्मस्थानमें उठी पिटिका और उप- द्रवयुक्त हो तथा दुर्बलाग्नि पुरुषकी पिटिका त्याज्य है । पिटिकाके उपद्रव चरकने कहे हैं सो इस प्रकार-"तृट्कासमांससंकोचमोहहिक्कामदज्वराः । विसर्पमर्मसंरोधाः पिटिकानामुपद्रवाः ॥" इसका अर्थ सुगम है इसीसे नहीं लिखा । शंका-क्यों जी ! स्त्रियोंको प्रमेह क्यों नहीं होय ? उत्तर-इसका कारण और ग्रन्थोंमें इस प्रकार लिखा है-" रजःप्रसेकान्नारीणां मासि मासि विशुध्यति । कृत्स्नं शरीरं दोषाश्च न प्रमेहन्त्यत स्त्रियः ॥ " स्त्रियोंके महीनेके महीने रज बहा करै है इसीसे सर्व देह और दोष शुद्ध होते हैं इसीसे स्त्रियोंको प्रमेह होना कहीं नहीं देखा, यह भी एक बलवान् कारण है और सोमादिक रोग होते हैं। कदाचित कोई कहे कि और रोगका होना CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA