माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
by माधवकर
Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextभाषाटीकासमेत । ( १९७ ) चापि कांक्षति । विकारांश्चाश्नुते घोरान्कांश्चित्कालव्यति- क्रमात् ॥ ६ ॥ एतावुद्रवकरौ विशेषादग्निमारुतौ । एतौ हि दहतः स्थूलं वनं दावानलो यथा ॥ ७ ॥ मेदसे मार्ग रुकजानेसे कोठेमें पवनका सञ्चार विशेष होय तब अग्निको यह पवन बढावे, भोजनकिये आहारको तुरन्त शोषण करे, तब वह आहार शीघ्र पच कर फिर भोजनकी इच्छाको प्रगट करे और भोजन करनेमें कालका व्यतिक्रम होनेसे भयंकर वातके रोग उत्पन्न होय । यह अग्नि और वायु बडा उपद्रव करै है, जैसे दावानल (वन अग्नि) वनको जलावै है उसी प्रकार ये दोनों उस स्थूल (मोटे) पुरुषको जलाती है ॥ अत्यन्त मेद बढनेका परिणाम । मेदस्यतीव संवृद्धे सहसैवानिलादयः । विकारान्दारुणान्कृत्वा नाशयन्त्याशु जीवितम् ॥ ८ ॥ मेद अत्यन्त बढनेसे वायु आदि ये अकस्मात् भयंकर विकार (प्रमेह पिटिका ज्वर भगन्दर विद्रधि वातरोग इत्यादि) उत्पन्न करके शीघ्रही जीवनका नाश करें ॥ स्थूललक्षण । मेदोमांसातिवृद्धत्वाच्चलस्फिगुदरस्तनः । अयथोपचयोत्साहो नरोऽतिस्थूल उच्यते ॥ ९ ॥ मेद और मांस ये अत्यन्त बढनेसे जिस पुरुषके कूले पेट और स्तन ये थलथल हले और उसके शरीरकी स्थूलता बढी होय अर्थात् जैसी चाहिये तैसी न होय तथा उत्साह (होशियारी) न रहे ऐसे मनुष्यको अतिस्थूल कहते हैं ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थदीपिकामाथुरीभाषाटीकायां मेदोनिदानं समाप्तम् ॥ अथ कार्श्यनिदानम् । प्रसंगवशसे कार्श्य (क्षीणता) रोगका निदान ग्रन्थान्तरसे लिखते हैं- वातो रूक्षान्नपानानि लङ्घनं प्रमिताशनम् । क्रियातियोगः शोकश्च वेगनिद्राविनिग्रहः ॥ १ ॥ नित्यं रोगोऽरतिर्नित्यं व्यायामो भोजनाल्पता । भीतिर्धनादिचिन्ता च कार्श्यकारण-