BharatKosha
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

by माधवकर

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

DevanagariSanskritpublished404 pages

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भाषाटीकासमेत । ( ३२९ ) नेत्रके शुक्लभागमें कांसेके समान कठिन अथवा पानीकी बूँदके समान ऊंची जो गांठ होय उसको बलास कहते हैं ॥ इति शुक्लरोग ॥ नेत्रकी सन्धिके रोग । पूयालसके लक्षण । पक्वः शोथः संधिजो यः सतोदः स्रवेत्पूयं पूति पूयालसाख्यः । नेत्रकी सन्धिमें सूजन होवे और पककर फूट जाय, उसमेंसे दुर्गन्धि राध बहे तथा तोद ( सुई छेदनेकीसी पीडा ) होय, उसको पूयालस कहते हैं ॥ उपनाहके लक्षण । ग्रन्थिर्नाल्पो दृष्टिसंधावपाकी कंडूप्रायो नीरुजस्तूपनाहः ॥ ७३ ॥ नेत्रकी संधिमें बडी गांठ होवे, वह थोडी पके, उसमें खुजली बहुत हो, दूखे नहीं उसको उपनाह कहते हैं ॥ स्राव अथवा नेत्रनाडीके लक्षण । गत्वा संधीनश्रुमार्गेण दोषाः कुर्युः स्रावाँल्लक्षणैः स्वैरुपैतान् । तं हि स्रावं नेत्रनाडीति चैके तस्या लिङ्गं कीर्तयिष्ये चतुर्धा ॥७४॥ वातादि दोष अश्रुमार्गसे सन्धियोंमें प्राप्त होकर स्वकीयलक्षणयुक्त स्राव उत्पन्न करे उस स्रावको कोई नेत्रनाडी कहते हैं । यह रोग चार प्रकारका है, उसके लक्षण कहते हैं । शंका-क्योंजी ! वातका स्राव क्यों नहीं कहा ? उत्तर-वातमें स्राव नहीं होता है इसीसे विदेहने चारही प्रकारके स्राव कहे हैं ॥ पाकः संधौ संस्रवेद्यस्तु पूयं पूयास्रावोऽसौ गदः सर्वजस्तु । श्वेतं सान्द्रं पिच्छिलं संस्रवेद्धि श्लेष्मस्रावोऽसौ विकारो मतस्तु॥७५॥ रक्तस्रावः शोणिताद्यो विकारः स्रवेदुष्णं तत्र रक्तं प्रभूतम् । हारिद्राभं पीतमुष्णं जलं वा पित्तास्रावः संस्रवेत्संधिमध्यात् ॥ ७६ ॥ पूयास्राव नेत्रकी संधिमें सूजन होकर पके तथा उसमेंसे राध बहे, यह रोग सन्निपातात्मक है । श्लेष्मस्राव जिसमें सफेद, गाढी और चिकनी राध बहे । रक्त- स्राव-जिस विकारमें विशेष गरम रुधिर बहे उसको रक्तस्राव कहते हैं । पित्तास्राव- जिसकी सन्धिमें हल्दीके समान पीला गरम जल बहे उसको पित्तास्राव कहते हैं ॥ १ सन्निपातात्कफाद्रक्तात्पित्तात्स्रावोऽक्षिसंधिषु ॥ इति । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA