माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
by माधवकर
Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in context( ७६ ) माधवनिदान । रुधिरकी कृमिके लक्षण । रक्तवाहिशिरास्थाना रक्तजा जन्तवोऽणवः । अपादा वृत्तताम्राश्च सौक्ष्म्यात्केचिददर्शनाः ॥ ११ ॥ केशादा रोमविध्वंसा रोमद्वीपा उदुम्बराः । षट् ते कुष्ठैककर्माणः सह सौरसमातरः ॥ १२ ॥ रुधिरकी बहनेवाली नाडियोंमें रुधिरसे प्रगट कृमि बारीक, पादरहित, गोले तांबेके रंगके होते हैं, कोई बहुत बारीक होती हैं, वह देखनेसे भी नहीं दीखे। ये कृमि छः प्रकारकी हैं। उनके नाम ये हैं-१ केशाद, २ रोमविध्वंस, ३ रोमद्वीप, ४ उदुम्बर, ५ सौरस, ६ मातर ये कुष्ठको पैदा करती हैं ॥ विष्ठासे प्रटग कृमिके लक्षण । पक्वाशयपुरीषोत्था जायन्तेऽधोविसर्पिणः । वृद्धास्ते स्युर्भवेयुश्च ते यदाऽऽमाशयोन्मुखाः ॥ १३ ॥ तदास्योद्गारनिश्वासा विड्गन्धानुविधायिनः । पृथुवृत्ततनुस्थूलाः श्यावपीतसितासिताः ॥ १४ ॥ ते पञ्च नाम्ना कृमयः ककेरुकमकेरुकाः । सौसुरादामलूनाश्च लेलिहा जनयन्ति च ॥ १५ ॥ विड्भेदशूलविष्टम्भकार्श्यपारुष्यपाण्डुताः । रोमहर्षाग्निसदनं गुदकण्डूर्विमार्गगाः ॥ १६ ॥ पक्वाशयमें विष्ठासे प्रगट कृमि गुदाके मार्ग होकर बाहर निकलती हैं। जब ये बढ जाती हैं तब आमाशयमें प्राप्त होकर डकार और श्वाससे विष्ठाकीसी वास आने लगती है । ये कृमि बडी, छोटीं, गोल, मोटी, रंगमें, काली, पीली, सफेद नीली होती हैं। इनके पांच नाम हैं-१ कके रुक, २ मके रुक, ३ सौसुराद, ४ आमलून, ५ लेलिह । जब ये कृमि मार्गको छोड अन्य मार्गमें जाती हैं तब इतने रोग प्रगट करैं हैं। दस्तका पतला होना, शूल, अफरा, देहमें कृशता तथा देहमें कठोरता, पाण्डुरोग, रोमांच, मन्दाग्नि और गुदामें खुजलीका होना ॥ इति श्रीपण्डितदत्ताराममाथुरप्रणीतमाधवार्थबोधिनीभाषाटीकायां कृमिरोगनिदानं समाप्तम् ॥ १ संमूलाख्येति पाठान्तरम् । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA