BharatKosha
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

by माधवकर

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

DevanagariSanskritpublished404 pages

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भाषाटीकासमेत । ( ८१ ) जो पाण्डुरोगी अत्यन्त पित्तकारक वस्तुओंके सेवन करे उसके पित्त, रुधिर मांसको जलाय ( दुष्ट कर ) कामलारूप रोग प्रगट करनेको समर्थ होय, उस मनु- ष्यके नेत्र अत्यन्त पीले होयँ, त्वचा, नख और मुख ये पीले होयँ, रक्तपित्तयुक्त मल, मूत्र काले होयँ अथवा पीले होयँ, वह मनुष्य वर्षाऋतुमें मेंढकके समान पीला होवे, इन्द्रियोंकी शक्ति नष्ट होय, दाह, अन्न पचे नहीं, दुर्बलता, अंगग्लानि, अन्नमें अरुचि इनसे पीडित होय. जिसमें पित्त प्रवल है ऐसी यह कामला एक कोष्ठाश्रय और दूसरी शाखा ( रक्तादि धातु ) आश्रित है । जैसे कासरोगसे भी राजयक्ष्मा पैदा होती है और स्वतन्त्र भी होती है उसी प्रकार कामला स्वतन्त्र भी होती है ॥ अब कहते हैं कि, पाण्डुरोगको उपेक्षा करनेसेही कामलादिक होते हैं उसीकी दूसरी अवस्था कुंभकामला है । अथ कुम्भकामलाके लक्षण । कालान्तरात्खरिभूता कृच्छा स्यात्कुम्भकामला । बहुत कालसे पुरानी पडनेसे जो कुंभकामला होवे सो कृच्छ्रसाध्य होती है । कुम्भ कहिये कोष्ठ तद्गत जो कामला उसको कुम्भकामला कहते हैं अर्थात् कोष्ठाश्रय कामला ॥ असाध्य कामलाके लक्षण । कृष्णपीतशकृन्मूत्रो भृशं शूनश्च मानवः । संरक्ताक्षिमखच्छर्दिंविण्मूत्रो यश्च ताम्यति ॥ २१ ॥ जिस मनुष्यका मल काला और मूत्र पीला हो और शरीरपर सूजन विशेष होवे और नेत्र मुख, वमन, मल और मूत्र ये अत्यन्त लाल होयँ, मोह होय वह कामलावान् रोगी बचे नहीं ॥ दाहारुचित्तृडानाहतन्द्रामोहसमन्वितः । नष्टाग्निसंज्ञः क्षिप्रं च कामलावान्विपद्यते ॥ २२ ॥ दूसरे असाध्य लक्षण-दाह, अरुचि, प्यास, अफरा, तन्द्रा इन लक्षणयुक्त तथा मन्दाग्नि और विस्मृतिवान् कामलावाला रोगी तत्काल मरे ॥ १" स्थानान्यामाग्निपक्वानां मूत्रस्य रुधिरस्य च । हृदुण्डुकः फुप्फुसश्च कोष्ठ इत्यभिधीयते ॥"