महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextषट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
विदुरके भेजे हुए खनकद्वारा लाक्षागृहमें सुरंगका निर्माण
वैशम्पायन उवाच
विदुरस्य सुहृत् कश्चित् खनकः कुशलो नरः ।
विविक्ते पाण्डवान् राजन्निदं वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! एक सुरंग खोदनेवाला मनुष्य विदुरजीका हितैषी एवं विश्वास-पात्र था। वह अपने काममें बड़ा चतुर था। एक दिन वह एकान्तमें पाण्डवोंसे मिला और इस प्रकार कहने लगा— ॥ १ ॥
प्रहितो विदुरेणास्मि खनकः कुशलो ह्यहम् ।
पाण्डवानां प्रियं कार्यमिति किं करवाणि वः ॥ २ ॥
प्रच्छन्नं विदुरेणोक्तः श्रेयस्त्वमिति पाण्डवान् ।
प्रतिपादय विश्वासादिति किं करवाणि वः ॥ ३ ॥
'मुझे विदुरजीने भेजा है। मैं सुरंग खोदनेके काममें बड़ा निपुण हूँ। मुझे आप पाण्डवोंका प्रिय कार्य करना है, अतः आपलोग बतायें, मैं आपकी क्या सेवा करूँ? विदुरने गुप्तरूपसे मुझसे यह कहा है कि तुम वारणावतमें जाकर विश्वासपूर्वक पाण्डवोंका हित सम्पादन करो। अतः आप आज्ञा कीजिये कि मैं क्या करूँ? ।। २-३ ।।