महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextमालां च समुपादाय काञ्चनीं समलंकृताम् । अवतीर्णा ततो रङ्गं द्रौपदी भरतर्षभ ।। ३० ।। सोलहवें दिन अत्यन्त मनोहर समाज जुटा। भरतश्रेष्ठ! उसी दिन स्नान करके सुन्दर वस्त्र और सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित हो हाथोंमें सोनेकी बनी हुई कामदार जयमाला लिये द्रुपदराजकुमारी उस रंग-भूमिमें उतरी ।। २९-३० ।। पुरोहितः सोमकानां मन्त्रविद् ब्राह्मणः शुचिः । परिस्तीर्य जुहावाग्निमाज्येन विधिवत् तदा ।। ३१ ।। तब सोमवंशी क्षत्रियोंके पवित्र एवं मन्त्रज्ञ ब्राह्मण पुरोहितने अग्निवेदीके चारों ओर कुशा बिछाकर वेदोक्त विधिके अनुसार प्रज्वलित अग्निमें घीकी आहुति डाली ।। ३१ ।। संतर्पयित्वा ज्वलनं ब्राह्मणान् स्वस्ति वाच्य च । वारयामास सर्वाणि वादित्राणि समन्ततः ।। ३२ ।। इस प्रकार अग्निदेवको तृप्त करके ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर चारों ओर बजनेवाले सब प्रकारके बाजे बंद करा दिये गये ।। ३२ ।। निःशब्दे तु कृते तस्मिन् धृष्टद्युम्नो विशाम्पते । कृष्णामादाय विधिवन्मेघदुन्दुभिनिःस्वनः ।। ३३ ।। रङ्गमध्ये गतस्तत्र मेघगम्भीरया गिरा । वाक्यमुच्चैर्जगादेदं श्लक्ष्णमर्थवदुत्तमम् ।। ३४ ।। महाराज! बाजोंकी आवाज बंद हो जानेपर जब स्वयंवरसभामें सन्नाटा छा गया, तब विधिके अनुसार धृष्टद्युम्न द्रौपदीको (साथ) लेकर रंगमण्डपके बीचमें खड़ा हो मेघ और दुन्दुभिके समान स्वर तथा मेघ-गर्जनकी-सी गम्भीर वाणीमें यह अर्थयुक्त उत्तम एवं मधुर वचन बोला— ।। ३३-३४ ।।