महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextतथैव मुनिजा वार्क्षी तपोभिर्भावितात्मनः । संगताभूद् दश भ्रातृनेकनाम्नः प्रचेतसः ॥ १५ ॥ इसी प्रकार कण्डु मुनिकी पुत्री वार्क्षीने तपस्यासे पवित्र अन्तःकरणवाले दस प्रचेताओेंके साथ, जिनका एक ही नाम था और जो आपसमें भाई-भाई थे, विवाहसम्बन्ध स्थापित किया था ॥ १५ ॥ गुरोर्हि वचनं प्राहुर्धर्म्यं धर्मज्ञसत्तम । गुरूणां चैव सर्वेषां माता परमको गुरुः ॥ १६ ॥ धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ व्यासजी! गुरुजनोंकी आज्ञाको धर्मसंगत बताया गया है और समस्त गुरुओंमें माता परम गुरु मानी गयी है ॥ १६ ॥ सा चाप्युक्तवती वाचं भैक्षवद् भुज्यतामिति । तस्मादेतदहं मन्ये परं धर्मं द्विजोत्तम ॥ १७ ॥ हमारी माताने भी यही बात कही है कि तुम सब लोग भिक्षाकी भाँति इसका उपभोग करो; अतः द्विजश्रेष्ठ! हम पाँचों भाइयोंके साथ होनेवाले इस विवाहसम्बन्धको परम धर्म मानते हैं ॥ १७ ॥
<center>कुन्त्युवाच</center>एवमेतद् यथा प्राह धर्मचारी युधिष्ठिरः । अनृतान्मे भयं तीव्रं मुच्येऽहमनृतात् कथम् ॥ १८ ॥ **कुन्तीने कहा—**धर्मका आचरण करनेवाले युधिष्ठिरने जैसा कहा है, वह ठीक है। (अवश्य मैंने द्रौपदीके साथ पाँचों भाइयोंके विवाहसम्बन्धकी आज्ञा दे दी है।) मुझे झूठसे बहुत भय लगता है; बताइये, मैं झूठके पापसे कैसे बच सकूँगी? ॥ १८ ॥
<center>व्यास उवाच</center>अनृतान्मोक्ष्यसे भद्रे धर्मश्चैष सनातनः । न तु वक्ष्यामि सर्वेषां पाञ्चाल शृणु मे स्वयम् ॥ १९ ॥ **व्यासजी बोले—**भद्रे! तुम झूठसे बच जाओगी। (पाण्डवोंके लिये) यह सनातन धर्म है। (कुन्तीसे यों कहकर वे द्रुपदसे बोले) पांचालराज! (इस विवाहमें एक रहस्य है, जिसे) मैं सबके सामने नहीं कहूँगा। तुम स्वयं एकान्तमें चलकर मुझसे सुन लो ॥ १९ ॥ यथायं विहितो धर्मो यतश्चायं सनातनः । यथा च प्राह कौन्तेयस्तथा धर्मो न संशयः ॥ २० ॥ जिस प्रकार और जिस कारणसे यह सनातन धर्मके अनुकूल कहा गया है और कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने जिस प्रकार इसकी धर्मानुकूलताका प्रतिपादन किया है, उसपर विचार करनेसे निस्संदेह यही सिद्ध होता है कि यह विवाह धर्मसम्मत है ॥ २० ॥
<center>वैशम्पायन उवाच</center>