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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,256 pages

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पततो वैनतेयस्य गतिमन्ये यथा खगाः । विनाशमुपयास्यन्ति ये चास्य परिपन्थिनः ॥ ८ ॥ ‘यह पराक्रमयुक्त होकर सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंको प्राप्त कर लेगा। जैसे उड़ते हुए गरुडके वेगको दूसरे पक्षी नहीं पा सकते, उसी प्रकार इस बलवान् राजकुमारके शौर्यका अनुसरण दूसरे राजा नहीं कर सकेंगे। जो लोग इससे शत्रुता करेंगे, वे नष्ट हो जायँगे ।। ७-८ ।।

देवैरपि विसृष्टानि शस्त्राण्यस्य महीपते । न रुजं जनयिष्यन्ति गिरेरिव नदीरयाः ॥ ९ ॥ ‘महीपते! जैसे नदीका वेग किसी पर्वतको पीड़ा नहीं पहुँचा सकता, उसी प्रकार देवताओंके छोड़े हुए अस्त्र-शस्त्र भी इसे चोट नहीं पहुँचा सकेंगे ।। ९ ।।

सर्वमूर्धाभिषिक्तानामेष मूर्ध्नि ज्वलिष्यति । प्रभाहरोऽयं सर्वेषां ज्योतिषामिव भास्करः ॥ १० ॥ ‘जिनके मस्तकपर राज्याभिषेक हुआ है, उन सभी राजाओंके ऊपर रहकर यह अपने तेजसे प्रकाशित होता रहेगा। जैसे सूर्य समस्त ग्रह-नक्षत्रोंकी कान्ति हर लेते हैं, उसी प्रकार यह राजकुमार समस्त राजाओंके तेजको तिरस्कृत कर देगा ।। १० ।।

एनमासाद्य राजानः समृद्धबलवाहनाः । विनाशमुपयास्यन्ति शलभा इव पावकम् ॥ ११ ॥ ‘जैसे फतिंगे आगमें जलकर भस्म हो जाते हैं, उसी प्रकार सेना और सवारियोंसे भरे-पूरे समृद्धिशाली नरेश भी इससे टक्कर लेते ही नष्ट हो जायँगे ।। ११ ।।

एष श्रियः समुदिताः सर्वराज्ञां ग्रहीष्यति । वर्षास्वि वोदीर्णजला नदीर्नदनदीपतिः ॥ १२ ॥ ‘यह समस्त राजाओंकी संगृहीत सम्पदाओंको उसी प्रकार अपने अधिकारमें कर लेगा, जैसे नदों और नदियोंका अधिपति समुद्र वर्षा-ऋतुमें बढ़े हुए जलवाली नदियोंको अपनेमें मिला लेता है ।। १२ ।।

एष धारयिता सम्यक् चातुर्वर्ण्यं महाबलः । शुभाशुभमिव स्फीता सर्वसस्यधरा धरा ॥ १३ ॥ ‘यह महाबली राजकुमार चारों वर्णोंको भलीभाँति धारण करेगा (उन्हें आश्रय देगा;) ठीक वैसे ही, जैसे सभी प्रकारके धान्योंको धारण करनेवाली समृद्धिशालिनी पृथ्वी शुभ और अशुभ सबको आश्रय देती है ।। १३ ।।

अस्याज्ञावशगाः सर्वे भविष्यन्ति नराधिपाः । सर्वभूतात्मभूतस्य वायोरिव शरीरिणः ॥ १४ ॥ ‘जैसे सब देहधारी समस्त प्राणियोंके आत्मारूप वायुदेवके अधीन होते हैं, उसी प्रकार सभी नरेश इसकी आज्ञाके अधीन होंगे ।। १४ ।।