महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextपाण्डवजनित आगसे दग्ध होनेवाले राजाओंने वह अपराध क्षमा कर दिया। अन्यथा इतने बड़े अन्यायको कौन सह सकता है? ॥ २६॥ वासुदेवेन तत् कर्म यथायुक्तं महत् कृतम् । सिद्धं च पाण्डुपुत्राणां प्रतापेन महात्मनाम् ॥ २७॥ वासुदेव श्रीकृष्णने जैसा महान् अनुचित कर्म किया था, वह महामना पाण्डवोंके प्रतापसे सफल हो गया ॥ २७॥ तथा हि रत्नान्यादाय विविधानि नृपा नृपम् । उपातिष्ठन्त कौन्तेयं वैश्या इव करप्रदाः ॥ २८॥ जैसे कर देनेवाले व्यापारी वैश्य नाना प्रकारके रत्नोंकी भेंट लेकर राजाकी सेवामें उपस्थित होते हैं, उसी प्रकार सब राजा अनेक प्रकारके उत्तम रत्न लेकर राजा युधिष्ठिरकी सेवामें उपस्थित हुए थे ॥ २८॥ श्रियं तथाऽऽगतां दृष्ट्वा ज्वलन्तीमिव पाण्डवे । अमर्षवशमापन्नो दह्यामि न तथोचितः ॥ २९॥ पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरके समीप प्राप्त हुई उस प्रकाश-मयी लक्ष्मीको देखकर मैं ईर्ष्यावश जल रहा हूँ। यद्यपि मेरी यह दुरवस्था उचित नहीं है ॥ २९॥ एवं स निश्चयं कृत्वा ततो वचनमब्रवीत् । पुनर्गान्धारनृपतिं दह्यमान इवाग्निना ॥ ३०॥ ऐसा निश्चय करके दुर्योधन चिन्ताकी आगसे दग्ध-सा होता हुआ पुनः गान्धारराज शकुनिसे बोला ॥ ३०॥ वह्निमेव प्रवेक्ष्यामि भक्षयिष्यामि वा विषम् । अपो वापि प्रवेक्ष्यामि न हि शक्ष्यामि जीवितुम् ॥ ३१॥ मैं आगमें प्रवेश कर जाऊँगा, विष खा लूँगा अथवा जलमें डूब मरूँगा, अब मैं जीवित नहीं रह सकूँगा ॥ ३१॥ को हि नाम पुमाँल्लोके मर्षयिष्यति सत्त्ववान् । सपत्नान्मृद्ध्यतो दृष्ट्वा हीनमात्मानमेव च ॥ ३२॥ संसारमें कौन ऐसा शक्तिशाली पुरुष होगा, जो शत्रुओंकी वृद्धि और अपनी हीन दशा होती देखकर भी चुपचाप सहन कर लेगा ॥ ३२॥ सोऽहं न स्त्री न चाप्यस्त्री न पुमान्नापुमानपि । योऽहं तां मर्षयाम्यद्य तादृशीं श्रियमागताम् ॥ ३३॥ मैं इस समय न तो स्त्री हूँ, न अस्त्रबलसे सम्पन्न हूँ, न पुरुष हूँ और न नपुंसक ही हूँ, तो भी अपने शत्रुओंके पास आयी हुई वैसी उत्कृष्ट सम्पत्तिको देखकर भी चुपचाप सहन कर रहा हूँ? ॥ ३३॥ ईश्वरत्वं पृथिव्याश्च वसुमत्तां च तादृशीम् ।