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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,256 pages

Page 362 of 2256

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Page 362

पदातिर्बद्धनिस्त्रिंशस्ततायुधकलापवान् ।
न चाससाद गहने मृगं नष्टं पिता तव ॥ २५ ॥
वे तलवार बाँधे पैदल ही चल रहे थे। उनके पास बाणोंसे भरा हुआ विशाल तूणीर था। वह घायल पशु उस घने वनमें कहीं छिप गया। तुम्हारे पिता बहुत खोजनेपर भी उसे पा न सके ॥ २५ ॥
परिश्रान्तो वयःस्थश्च षष्टिवर्षो जरान्वितः ।
क्षुधितः स महारण्ये ददर्श मुनिसत्तमम् ॥ २६ ॥
स तं पप्रच्छ राजेन्द्रो मुनिं मौनव्रते स्थितम् ।
न च किंचिदुवाचैनं पृष्टोऽपि स मुनिस्तदा ॥ २७ ॥
प्रौढ़ अवस्था, साठ वर्षकी आयु और बुढ़ापेका संयोग इन सबके कारण वे बहुत थक गये थे। उस विशाल वनमें उन्हें भूख सताने लगी। इसी दशामें महाराजने वहाँ मुनिश्रेष्ठ शमीकको देखा। राजेन्द्र परीक्षित्ने उनसे मृगका पता पूछा; किंतु वे मुनि उस समय मौनव्रतके पालनमें संलग्न थे। उनके पूछनेपर भी महर्षि शमीक उस समय कुछ न बोले ॥ २६-२७ ॥
ततो राजा क्षुच्छ्रमार्तस्तं मुनिं स्थाणुवत् स्थितम् ।
मौनव्रतधरं शान्तं सद्यो मन्युवशं गतः ॥ २८ ॥
वे काठकी भाँति चुपचाप, निश्चेष्ट एवं अविचल भावसे स्थित थे। यह देख भूख-प्यास और थकावटसे व्याकुल हुए राजा परीक्षित्को उन मौनव्रतधारी शान्त महर्षिपर तत्काल क्रोध आ गया ॥ २८ ॥
न बुबोध च तं राजा मौनव्रतधरं मुनिम् ।
स तं क्रोधसमाविष्टो धर्षयामास ते पिता ॥ २९ ॥
राजाको यह पता नहीं था कि महर्षि मौनव्रतधारी हैं; अतः क्रोधमें भरे हुए आपके पिताने उनका तिरस्कार कर दिया ॥ २९ ॥
मृतं सर्पं धनुष्कोट्या समुत्क्षिप्य धरातलात् ।
तस्य शुद्धात्मनः प्रादात् स्कन्धे भरतसत्तम ॥ ३० ॥
भरतश्रेष्ठ! उन्होंने धनुषकी नोकसे पृथ्वीपर पड़े हुए एक मृत सर्पको उठाकर उन शुद्धात्मा महर्षिके कंधेपर डाल दिया ॥ ३० ॥
न चोवाच स मेधावी तमथो साध्वसाधु वा ।
तस्थौ तथैव चाक्रुद्धः सर्पं स्कन्धेन धारयन् ॥ ३१ ॥
किंतु उन मेधावी मुनिने इसके लिये उन्हें भला या बुरा कुछ नहीं कहा। वे क्रोधरहित हो कंधेपर मरा सर्प लिये हुए पूर्ववत् शान्त-भावसे बैठे रहे ॥ ३१ ॥