महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextसमानता कर रहे हो। जैसे भीष्मपितामहने उत्तम ब्रह्मचर्यव्रतका पालन किया था, उसी प्रकार तुम भी इस यज्ञमें परम उत्तम व्रतका पालन करते हुए शोभा पा रहे हो ॥ १३ ॥
वाल्मीकिवत् ते निभृतं स्ववीर्यं
वसिष्ठवत् ते नियतश्च कोपः ।
प्रभुत्वमिन्द्रत्वसमं मतं मे
द्युतिश्च नारायणवद् विभाति ॥ १४ ॥
महर्षि वाल्मीकिकी भाँति तुम्हारा अद्भुत पराक्रम तुममें ही छिपा हुआ है। महर्षि वसिष्ठजीके समान तुमने अपने क्रोधको काबूमें कर रखा है। मेरी ऐसी मान्यता है कि तुम्हारा प्रभुत्व इन्द्रके ऐश्वर्यके तुल्य है और तुम्हारी अंगकान्ति भगवान् नारायणके समान सुशोभित होती है ॥ १४ ॥
यमो यथा धर्मविनिश्चयज्ञः
कृष्णो यथा सर्वगुणोपपन्नः ।
श्रिया निवासोऽसि यथा वसूनां
निधानभूतोऽसि तथा ऋतूनाम् ॥ १५ ॥
तुम यमराजकी भाँति धर्मके निश्चित सिद्धान्तको जाननेवाले हो। भगवान् श्रीकृष्णकी भाँति सर्वगुणसम्पन्न हो। वसुगणोंके पास जो सम्पत्तियाँ हैं, वैसी ही सम्पदाओंके तुम निवासस्थान हो तथा यज्ञोंकी तो तुम साक्षात् निधि ही हो ॥ १५ ॥
दम्भोद्भवैनासि समो बलेन
रामो यथा शास्त्रविदस्त्रविच्च ।
और्वत्रिताभ्यामसि तुल्यतेजा
दुष्प्रेक्षणीयोऽसि भगीरथेन ॥ १६ ॥
राजन्! तुम बलमें दम्भोद्भवके समान और अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञानमें परशुरामके सदृश हो। तुम्हारा तेज और्व और त्रित नामक महर्षियोंके तुल्य है। राजा भगीरथकी भाँति तुम्हारी ओर देखना भी कठिन है ॥ १६ ॥
सौतिरुवाच
एवं स्तुताः सर्व एव प्रसन्ना
राजा सदस्या ऋत्विजो हव्यवाहः ।
तेषां दृष्ट्वा भावितानीङ्गितानि
प्रोवाच राजा जनमेजयोऽथ ॥ १७ ॥
**उग्रश्रवाजी कहते हैं—**आस्तीकके इस प्रकार स्तुति करनेपर यजमान राजा जनमेजय, सदस्य, ऋत्विज् और अग्निदेव सभी बड़े प्रसन्न हुए। इन सबके मनोभावों तथा बाह्य चेष्टाओंको लक्ष्य करके राजा जनमेजय इस प्रकार बोले ॥ १७ ॥