महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextनिश्चय ही इन्द्रने उस नागराज तक्षकको त्याग दिया है। उसका विशाल शरीर मन्त्रद्वारा आकृष्ट होकर स्वर्गलोकसे नीचे गिर पड़ा है। वह आकाशमें चक्कर काटता अपनी सुध-बुध खो चुका है और बड़े वेगसे लम्बी साँसें छोड़ता हुआ अग्निकुण्डके समीप आ रहा है ॥ १९ ॥
सौतिरुवाच
पतिष्यमाणे नागेन्द्रे तक्षके जातवेदसि ।
इदमन्तरमित्येव तदाऽऽस्तीकोऽभ्यचोदयत् ॥ २० ॥
**उग्रश्रवाजी कहते हैं—**शौनक! नागराज तक्षक अब कुछ ही क्षणोंमें आगकी ज्वालामें गिरनेवाला था। उस समय आस्तीकने यह सोचकर कि ‘यही वर माँगनेका अच्छा अवसर है’ राजाको वर देनेके लिये प्रेरित किया ॥ २० ॥
आस्तीक उवाच
वरं ददासि चेन्मह्यं वृणोमि जनमेजय ।
सत्रं ते विरमत्येतन्न पतेयुरिहोरगाः ॥ २१ ॥
**आस्तीकने कहा—**राजा जनमेजय! यदि तुम मुझे वर देना चाहते हो तो सुनो, मैं माँगता हूँ कि तुम्हारा यह यज्ञ बंद हो जाय और अब इसमें सर्प न गिरने पावें ॥ २१ ॥
एवमुक्तस्तदा तेन ब्रह्मन् पारिक्षितस्तु सः ।
नातिहृष्टमनाश्चेदमास्तीकं वाक्यमब्रवीत् ॥ २२ ॥
ब्रह्मन्! आस्तीकके ऐसा कहनेपर वे परीक्षित्-कुमार जनमेजय खिन्नचित्त होकर बोले — ॥ २२ ॥
सुवर्णं रजतं गाश्च यच्चान्यन्मन्यसे विभो ।
तत् ते दद्यां वरं विप्र न निवर्तेत् क्रतुर्मम ॥ २३ ॥
‘विप्रवर! आप सोना, चाँदी, गौ तथा अन्य अभीष्ट वस्तुओंको, जिन्हें आप ठीक समझते हों, माँग लें। प्रभो! वह मुँहमाँगा वर मैं आपको दे सकता हूँ, किंतु मेरा यह यज्ञ बंद नहीं होना चाहिये’ ॥ २३ ॥
आस्तीक उवाच
सुवर्णं रजतं गाश्च न त्वां राजन् वृणोम्यहम् ।
सत्रं ते विरमत्येतत् स्वस्ति मातृकुलस्य नः ॥ २४ ॥
**आस्तीकने कहा—**राजन्! मैं तुमसे सोना, चाँदी और गौएँ नहीं माँगूँगा, मेरी यही इच्छा है कि तुम्हारा यह यज्ञ बंद हो जाय, जिससे मेरी माताके कुलका कल्याण हो ॥ २४ ॥
सौतिरुवाच