महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextपाण्डववंशी जनमेजयसे वह पूजा ग्रहण करके गौके सम्बन्धमें अपना आदर व्यक्त करते हुए व्यासजी उस समय बड़े प्रसन्न हुए ॥ १४ ॥
तथा च पूजयित्वा तं प्रणयात् प्रपितामहम् । उपोपविश्य प्रीतात्मा पर्यपृच्छदनामयम् ॥ १५ ॥ पितामह व्यासजीका प्रेमपूर्वक पूजन करके जनमेजयका चित्त प्रसन्न हो गया और वे उनके पास बैठकर कुशल-मंगल पूछने लगे ॥ १५ ॥
भगवानपि तं दृष्ट्वा कुशलं प्रतिवेद्य च । सदस्यैः पूजितः सर्वैः सदस्यान् प्रत्यपूजयत् ॥ १६ ॥ भगवान् व्यासने भी जनमेजयकी ओर देखकर अपना कुशल-समाचार बताया तथा अन्य सभासदोंद्वारा सम्मानित हो उनका भी सम्मान किया ॥ १६ ॥
ततस्तु सहितः सर्वैः सदस्यैर्जनमेजयः । इदं पश्चाद् द्विजश्रेष्ठं पर्यपृच्छत् कृताञ्जलिः ॥ १७ ॥ तदनन्तर सब सदस्योंसहित राजा जनमेजयने हाथ जोड़कर द्विजश्रेष्ठ व्यासजीसे इस प्रकार प्रश्न किया ॥ १७ ॥
जनमेजय उवाच
कुरुणां पाण्डवानां च भवान् प्रत्यक्षदर्शिवान् । तेषां चरितमिच्छामि कथ्यमानं त्वया द्विज ॥ १८ ॥ जनमेजयने कहा—ब्रह्मन्! आप कौरवों और पाण्डवोंको प्रत्यक्ष देख चुके हैं; अतः मैं आपके द्वारा वर्णित उनके चरित्रको सुनना चाहता हूँ ॥ १८ ॥
कथं समभवद् भेदस्तेषामक्लिष्टकर्मणाम् । तच्च युद्धं कथं वृत्तं भूतान्तकरणं महत् ॥ १९ ॥ वे तो राग-द्वेष आदि दोषोंसे रहित सत्कर्म करनेवाले थे, उनमें भेद-बुद्धि कैसे उत्पन्न हुई? तथा प्राणियोंका अन्त करनेवाला उनका वह महायुद्ध किस प्रकार हुआ? ॥ १९ ॥
पितामहानां सर्वेषां दैवेनानिष्टचेतसाम् । कात्स्न्र्यैनैतन्ममाचक्ष्व यथावृत्तं द्विजोत्तम ॥ २० ॥ द्विजश्रेष्ठ! जान पड़ता है, प्रारब्धने ही प्रेरणा करके मेरे सब प्रपितामहोंके मनको युद्धरूपी अनिष्टमें लगा दिया था। उनके इस सम्पूर्ण वृत्तान्तका आप यथावत् रूपसे वर्णन करें ॥ २० ॥
सौतिरुवाच
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा कृष्णद्वैपायनस्तदा । शशास शिष्यमासीनं वैशम्पायनमन्तिके ॥ २१ ॥