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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,256 pages

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शूद्रकी योनिमें उत्पन्न हुए ॥ ९६ ॥ विद्वान् विदुररूपेण धर्मी तनुरकिल्बिषी । संजयो मुनिकल्पस्तु जज्ञे सूतो गवलगणात् ॥ ९७ ॥ पापरहित विद्वान् विदुरके रूपमें धर्मराजका शरीर ही प्रकट हुआ था। उसी समय गवलगणसे संजय नामक सूतका जन्म हुआ, जो मुनियोंके समान ज्ञानी और धर्मात्मा थे ॥ ९७ ॥

सूर्याच्च कुन्तिकन्याया जज्ञे कर्णो महाबलः । सहजं कवचं बिभ्रत् कुण्डलो द्योतिताननः ॥ ९८ ॥ राजा कुन्तिभोजकी कन्या कुन्तीके गर्भसे सूर्यके अंशसे महाबली कर्णकी उत्पत्ति हुई। वह बालक जन्मके साथ ही कवचधारी था। उसका मुख शरीरके साथ ही उत्पन्न हुए कुण्डलकी प्रभासे प्रकाशित होता था ॥ ९८ ॥

अनुग्रहार्थं लोकानां विष्णुर्लोकनमस्कृतः । वसुदेवात् तु देवक्यां प्रादुर्भूतो महायशाः ॥ ९९ ॥ उन्हीं दिनों विश्ववन्दित महायशस्वी भगवान् विष्णु जगत्के जीवोंपर अनुग्रह करनेके लिये वसुदेवजीके द्वारा देवकीके गर्भसे प्रकट हुए ॥ ९९ ॥

अनादिनिधनो देवः स कर्ता जगतः प्रभुः । अव्यक्तमक्षरं ब्रह्म प्रधानं त्रिगुणात्मकम् ॥ १०० ॥ वे भगवान् आदि-अन्तसे रहित, द्युतिमान्, सम्पूर्ण जगत्के कर्ता तथा प्रभु हैं। उन्हींको अव्यक्त अक्षर (अविनाशी) ब्रह्म और त्रिगुणमय प्रधान कहते हैं ॥ १०० ॥

आत्मानमव्ययं चैव प्रकृतिं प्रभवं प्रभुम् । पुरुषं विश्वकर्माणं सत्त्वयोगं ध्रुवाक्षरम् ॥ १०१ ॥ अनन्तमचलं देवं हंसं नारायणं प्रभुम् । धातारमजमव्यक्तं यमाहुः परमव्ययम् ॥ १०२ ॥ कैवल्यं निर्गुणं विश्वमनादिमजमव्ययम् । पुरुषः स विभुः कर्ता सर्वभूतपितामहः ॥ १०३ ॥ आत्मा, अव्यय, प्रकृति (उपादान), प्रभव (उत्पत्ति-कारण), प्रभु (अधिष्ठाता), पुरुष (अन्तर्यामी), विश्वकर्मा, सत्त्वगुणसे प्राप्त होने योग्य तथा प्रणवाक्षर भी वे ही हैं; उन्हींको अनन्त, अचल, देव, हंस, नारायण, प्रभु, धाता, अजन्मा, अव्यक्त, पर, अव्यय, कैवल्य, निर्गुण, विश्वरूप, अनादि, जन्मरहित और अविकारी कहा गया है। वे सर्वव्यापी, परम पुरुष परमात्मा, सबके कर्ता और सम्पूर्ण भूतोंके पितामह हैं ॥ १०१—१०३ ॥

धर्मसंवर्धनार्थाय प्रजज्ञेऽन्धकवृष्णिषु । अस्त्रज्ञौ तु महावीर्यौ सर्वशास्त्रविशारदौ ॥ १०४ ॥

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