महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
Page 464 of 2256
Read in contextसातवें सुपर्ण, विश्वावसु, भानु और दसवें सुचन्द्र—से दस देव-गन्धर्व भी प्राधाके ही पुत्र बताये गये हैं। इनके सिवा महाभागा देवी प्राधाने पहले देवर्षि (कश्यप)-के समागमसे इन प्रसिद्ध अप्सराओंके शुभ लक्षणवाले समुदायको उत्पन्न किया था। उनके नाम ये हैं—अलम्बुषा, मिश्रकेशी, विद्युत्पर्णा, तिलोत्तमा, अरुणा, रक्षिता, रम्भा, मनोरमा, केशिनी, सुबाहु, सुरता, सुरजा और सुप्रिया। अतिबाहु, सुप्रसिद्ध हाहा और हूहू तथा तुम्बुरु—ये चार श्रेष्ठ गन्धर्व भी प्राधाके ही पुत्र माने गये हैं ॥ ४५–५१ ॥
अमृतं ब्राह्मणा गावो गन्धर्वाप्सरसस्तथा ।
अपत्यं कपिलायास्तु पुराणे परिकीर्तितम् ॥ ५२ ॥
अमृत, ब्राह्मण, गौएँ, गन्धर्व तथा अप्सराएँ—ये सब पुराणमें कपिलाकी संतानें बतायी गयी हैं ॥ ५२ ॥
इति ते सर्वभूतानां सम्भवः कथितो मया ।
यथावत् सम्परिख्यातो गन्धर्वाप्सरसां तथा ॥ ५३ ॥
भुजङ्गानां सुपर्णानां रुद्राणां मरुतां तथा ।
गवां च ब्राह्मणानां च श्रीमतां पुण्यकर्मणाम् ॥ ५४ ॥
राजन्! इस प्रकार मैंने तुम्हें सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्तिका वृत्तान्त बताया है। इसी तरह गन्धर्वों, अप्सराओं, नागों, सुपर्णों, रुद्रों, मरुद्गणों, गौओं तथा श्रीसम्पन्न पुण्यकर्मा ब्राह्मणोंके जन्मकी कथा भी भलीभाँति कही है ॥ ५३-५४ ॥
आयुष्यश्चैव पुण्यश्च धन्यः श्रुतिसुखावहः ।
श्रोतव्यश्चैव सततं श्राव्यश्चैवानसूयता ॥ ५५ ॥
यह प्रसंग आयु देनेवाला, पुण्यमय, प्रशंसनीय तथा सुननेमें सुखद है। मनुष्यको चाहिये कि वह दोषदृष्टि न रखकर सदा इसे सुने और सुनावे ॥ ५५ ॥
इमं तु वंशं नियमेन यः पठेन्
महात्मनां ब्राह्मणदेवसंनिधौ ।
अपत्यलाभं लभते स पुष्कलं
श्रियं यशः प्रेत्य च शोभनां गतिम् ॥ ५६ ॥
जो ब्राह्मण और देवताओंके समीप महात्माओंकी इस वंशावलीका नियमपूर्वक पाठ करता है, वह प्रचुर संतान, सम्पत्ति और यश प्राप्त करता है तथा मृत्युके पश्चात् उत्तम गति पाता है ॥ ५६ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि आदित्यादिवंशकथने पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें आदित्यादिवंशकथनविषयक पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६५ ॥