महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextइस प्रकार आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य तथा प्रजापति और वषट्कार—ये तैंतीस मुख्य देवता हैं। अब मैं तुम्हें इनके पक्ष और कुल आदिके उल्लेखपूर्वक वंश और गण आदिका परिचय देता हूँ ॥ ३७ ॥
रुद्राणामपरः पक्षः साध्यानां मरुतां तथा । वसूनां भार्गवं विद्याद् विश्वेदेवांस्तथैव च ॥ ३८ ॥ रुद्रोंका एक अलग पक्ष या गण है, साध्य, मरुत् तथा वसुओंका भी पृथक्-पृथक् गण है। इसी प्रकार भार्गव तथा विश्वेदेवगणको भी जानना चाहिये ॥ ३८ ॥
वैनतेयस्तु गरुडो बलवानरुणस्तथा । बृहस्पतिश्च भगवानादित्येष्वेव गण्यते ॥ ३९ ॥ विनतानन्दन गरुड, बलवान् अरुण तथा भगवान् बृहस्पतिकी गणना आदित्योंमें ही की जाती है ॥ ३९ ॥
अश्विनौ गुह्यकान् विद्धि सर्वौषध्यस्तथा पशून् । एते देवगणा राजन् कीर्तितास्तेऽनुपूर्वशः ॥ ४० ॥ अश्विनीकुमार, सर्वौषधि तथा पशु—इन सबको गुह्यकसमुदायके भीतर समझो। राजन्! ये देवगण तुम्हें क्रमशः बताये गये हैं ॥ ४० ॥
यान् कीर्तयित्वा मनुजः सर्वपापैः प्रमुच्यते । ब्रह्मणो हृदयं भित्त्वा निःसृतो भगवान् भृगुः ॥ ४१ ॥ मनुष्य इन सबका कीर्तन करके सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। भगवान् भृगु ब्रह्माजीके हृदयका भेदन करके प्रकट हुए थे ॥ ४१ ॥
भृगोः पुत्रः कविर्विद्वाञ्छुक्रः कविसुतो ग्रहः । त्रैलोक्यप्राणयात्रार्थं वर्षावर्षे भयाभये । स्वयम्भुवा नियुक्तः सन् भुवनं परिधावति ॥ ४२ ॥ भृगुके विद्वान् पुत्र कवि हुए और कविके पुत्र शुक्राचार्य हुए, जो ग्रह होकर तीनों लोकोंके जीवनकी रक्षाके लिये वृष्टि, अनावृष्टि तथा भय और अभय उत्पन्न करते हैं। स्वयम्भू ब्रह्माजीकी प्रेरणासे वे समस्त लोकोंका चक्कर लगाते रहते हैं ॥ ४२ ॥
योगाचार्यो महाबुद्धिर्दैत्यानामभवद् गुरुः । सुराणां चापि मेधावी ब्रह्मचारी यतव्रतः ॥ ४३ ॥ महाबुद्धिमान् शुक्र ही योगके आचार्य और दैत्योंके गुरु हुए। वे ही योगबलसे मेधावी, ब्रह्मचारी एवं व्रतपरायण बृहस्पतिके रूपमें प्रकट हो देवताओंके भी गुरु होते हैं ॥ ४३ ॥
तस्मिन् नियुक्ते विधिना योगक्षेमाय भार्गवे ।