महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextअशोभत वनं तत् तु महेन्द्रध्वजसंनिभैः ॥ १४ ॥ फूलोंसे लदे हुए वृक्ष एक-दूसरेसे अपनी डालियोंको सटाकर मानो गले मिल रहे थे। वे गगनचुम्बी वृक्ष इन्द्रकी ध्वजाके समान जान पड़ते थे और उनके कारण उस वनकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ १४ ॥
सिद्धचारणसंघैश्च गन्धर्वाप्सरसां गणैः । सेवितं वनमत्यर्थं मत्तवानरकिन्नरम् ॥ १५ ॥ सिद्ध-चारणसमुदाय तथा गन्धर्व और अप्सराओंके समूह भी उस वनका अत्यन्त सेवन करते थे। वहाँ मतवाले वानर और किन्नर निवास करते थे ॥ १५ ॥
सुखः शीतः सुगन्धी च पुष्परेणुवहोऽनिलः । परिक्रामन् वने वृक्षानुपैतीव रिरंसया ॥ १६ ॥ उस वनमें शीतल, सुगन्ध, सुखदायिनी मन्द वायु फूलोंके पराग वहन करती हुई मानो रमणकी इच्छासे बार-बार वृक्षोंके समीप आती थी ॥ १६ ॥
एवंगुणसमायुक्तं ददर्श स वनं नृपः । नदीकच्छोद्भवं कान्तमुच्छ्रितध्वजसंनिभम् ॥ १७ ॥ वह वन मालिनी नदीके कछारमें फैला हुआ था और ऊँची ध्वजाओंके समान ऊँचे वृक्षोंसे भरा होनेके कारण अत्यन्त मनोहर जान पड़ता था। राजाने इस प्रकार उत्तम गुणोंसे युक्त उस वनका भलीभाँति अवलोकन किया ॥ १७ ॥
प्रेक्षमाणो वनं तत् तु सुप्रहृष्टविहङ्गमम् । आश्रमप्रवरं रम्यं ददर्श च मनोरमम् ॥ १८ ॥ इस प्रकार राजा अभी वनकी शोभा देख ही रहे थे कि उनकी दृष्टि एक उत्तम आश्रमपर पड़ी, जो अत्यन्त रमणीय और मनोरम था। वहाँ बहुत-से पक्षी हर्षोल्लासमें भरकर चहक रहे थे ॥ १८ ॥
नानावृक्षसमाकीर्णं सम्प्रज्वलितपावकम् । तं तदाप्रतिमं श्रीमाना श्रमं प्रत्यपूजयत् ॥ १९ ॥ नाना प्रकारके वृक्षोंसे भरपूर उस वनमें स्थान-स्थानपर अग्निहोत्रकी आग प्रज्वलित हो रही थी। इस प्रकार उस अनुपम आश्रमका श्रीमान् दुष्यन्त नरेशने मन-ही-मन बड़ा सम्मान किया ॥ १९ ॥
यतिभिर्वालखिल्यैश्च वृतं मुनिगणान्वितम् । अग्न्यगारैश्च बहुभिः पुष्पसंस्तरसंस्तृतम् ॥ २० ॥ वहाँ बहुत-से त्यागी विरागी यति, बालखिल्य ऋषि तथा अन्य मुनिगण निवास करते थे। अनेकानेक अग्निहोत्रगृह उस आश्रमकी शोभा बढ़ा रहे थे। वहाँ इतने फूल झड़कर गिरे थे कि उनके बिछौने-से बिछ गये थे ॥ २० ॥
महाकच्छैर्बृहद्भिश्च विभ्राजितमतीव च ।