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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,256 pages

Page 510 of 2256

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Page 510

ब्रह्मलोकप्रतीकाशमाश्रमं सोऽभिवीक्ष्य ह । षट्पदोद्गीतसंघुष्टं नानाद्विजगणायुतम् ॥ ३६ ॥ वहाँ ये तपस्याके भण्डार अविकारी महर्षि कण्वका दर्शन करना चाहते थे। राजाने उस आश्रमको देखा, मानो दूसरा ब्रह्मलोक हो। नाना प्रकारके पक्षी वहाँ कलरव कर रहे थे। भ्रमरोंके गुंजनसे सारा आश्रम गूँज रहा था ॥ ३६ ॥

ऋचो बह्वृचमुख्यैश्च प्रेर्यमाणाः पदक्रमैः । शुश्राव मनुजव्याघ्रो विततेष्विह कर्मसु ॥ ३७ ॥ श्रेष्ठ ऋग्वेदी ब्राह्मण पद और क्रमपूर्वक ऋचाओंका पाठ कर रहे थे। नरश्रेष्ठ दुष्यन्तने अनेक प्रकारके यज्ञसम्बन्धी कर्मोंमें पढ़ी जाती हुई वैदिक ऋचाओंको सुना ॥ ३७ ॥

यज्ञविद्याङ्गविद्भिश्च यजुर्विद्भिश्च शोभितम् । मधुरैः सामगीतैश्च ऋषिभिर्नियतव्रतैः ॥ ३८ ॥ भारुण्डसामगीताभिरथर्वशिरसोद्गतैः । यतात्मभिः सुनियतैः शुशुभे स तदाश्रमः ॥ ३९ ॥ यज्ञविद्या और उसके अंगोंकी जानकारी रखनेवाले यजुर्वेदी विद्वान् भी आश्रमकी शोभा बढ़ा रहे थे। नियमपूर्वक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करनेवाले सामवेदी महर्षियोंद्वारा वहाँ मधुरस्वरसे सामवेदका गान किया जा रहा था। मनको संयममें रखकर नियमपूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले सामवेदी और अथर्ववेदी महर्षि भारुण्डसंज्ञक साममन्त्रोंके गीत गाते और अथर्ववेदके मन्त्रोंका उच्चारण करते थे; जिससे उस आश्रमकी बड़ी शोभा होती थी ॥ ३८-३९ ॥

अथर्ववेदप्रवराः पूगयज्ञियसामगाः । संहितामीरयन्ति स्म पदक्रमयुतां तु ते ॥ ४० ॥ श्रेष्ठ अथर्ववेदीय विद्वान् तथा पूगयज्ञिय नामक सामके गायक सामवेदी महर्षि पद और क्रमसहित अपनी-अपनी संहिताका पाठ करते थे ॥ ४० ॥

शब्दसंस्कारसंयुक्तैर्ब्रुवद्भिश्चापरैर्द्विजैः । नादितः स बभौ श्रीमान् ब्रह्मलोक इवापरः ॥ ४१ ॥ दूसरे द्विजबालक शब्द-संस्कारसे सम्पन्न थे—वे स्थान, करण और प्रयत्नका ध्यान रखते हुए संस्कृतवाक्योंका उच्चारण कर रहे थे। इन सबके तुमुल शब्दोंसे गूँजता हुआ वह सुन्दर आश्रम द्वितीय ब्रह्मलोकके समान सुशोभित होता था ॥ ४१ ॥

यज्ञसंस्तरविद्भिश्च क्रमशिक्षाविशारदैः । न्यायतत्त्वात्मविज्ञानसम्पन्नैर्वेदपारगैः ॥ ४२ ॥ नानावाक्यसमाहारसमवायविशारदैः । विशेषकार्यविद्भिश्च मोक्षधर्मपरायणैः ॥ ४३ ॥ स्थापनाक्षेपसिद्धान्तपरमार्थज्ञतां गतैः ।