Skip to content
BharatKosha
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,256 pages

Page 517 of 2256

Read in context
Page 517

शकुन्तलोवाच

यथायमागमो मह्यं यथा चेदमभूत् पुरा ।
शृणु राजन् यथातत्त्वं यथास्मि दुहिता मुनेः ॥ १८ ॥
**शकुन्तलाने कहा—**राजन्! ये सब बातें मुझे जिस प्रकार ज्ञात हुई हैं, मेरा यह जन्म आदि पूर्वकालमें जिस प्रकार हुआ है और मैं जिस प्रकार कण्व मुनिकी पुत्री हूँ, वह सब वृत्तान्त ठीक-ठीक बता रही हूँ; सुनिये ॥ १८ ॥

(अन्यथा सन्तमात्मानमन्यथा सत्सु भाषते ।
स पापेनावृतो मूर्खः स्तेन आत्मापहारकः ॥)
जिसका स्वरूप तो अन्य प्रकारका है, किंतु जो सत्पुरुषोंके सामने उसका अन्य प्रकारसे ही परिचय देता है, अर्थात् जो पापात्मा होते हुए भी अपनेको धर्मात्मा कहता है, वह मूर्ख, पापसे आवृत्त, चोर एवं आत्मवंचक है।

ऋषिः कश्चिदिहागम्य मम जन्माभ्यचोदयत् ।
(ऊर्ध्वरेता यथासि त्वं कुतस्तेयं शकुन्तला ।
पुत्री त्वत्तः कथं जाता सत्यं मे ब्रूहि काश्यप ॥)
तस्मै प्रोवाच भगवान् यथा तच्छृणु पार्थिव ॥ १९ ॥
पृथ्वीपते! एक दिन किसी ऋषिने यहाँ आकर मेरे जन्मके सम्बन्धमें मुनिसे पूछा—'कश्यपनन्दन! आप तो ऊर्ध्वरेता ब्रह्मचारी हैं, फिर यह शकुन्तला कहाँसे आयी? आपसे पुत्रीका जन्म कैसे हुआ? यह मुझे सच-सच बताइये।' उस समय भगवान् कण्वने उससे जो बात बतायी, वही कहती हूँ, सुनिये ॥ १९ ॥

कण्व उवाच

तप्यमानः किल पुरा विश्वामित्रो महत् तपः ।
सुभृशं तापयामास शक्रं सुरगणेश्वरम् ॥ २० ॥
**कण्व बोले—**पहलेकी बात है, महर्षि विश्वामित्र बड़ी भारी तपस्या कर रहे थे। उन्होंने देवताओंके स्वामी इन्द्रको अपनी तपस्यासे अत्यन्त संतापमें डाल दिया ॥ २० ॥

तपसा दीप्तवीर्योऽयं स्थानान्मां च्यावयेदिति ।
भीतः पुरंदरस्तस्मान्मेनकामिदमब्रवीत् ॥ २१ ॥
इन्द्रको यह भय हो गया कि तपस्यासे अधिक शक्तिशाली होकर ये विश्वामित्र मुझे अपने स्थानसे भ्रष्ट कर देंगे, अतः उन्होंने मेनकासे इस प्रकार कहा— ॥ २१ ॥

गुणैरप्सरसां दिव्यैर्मेनके त्वं विशिष्यसे ।
श्रेयो मे कुरु कल्याणि यत् त्वां वक्ष्यामि तच्छृणु ॥ २२ ॥

असावादित्यसंकाशो विश्वामित्रो महातपाः ।
तप्यमानस्तपो घोरं मम कम्पयते मनः ॥ २३ ॥