महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextअमन्यमाना राजेन्द्र पितरं मे तपस्विनम् ।
अधर्मेण हि धर्मिष्ठ कथं वरमुपास्महे ॥
महाराज! पिता ही मेरे प्रभु हैं। उन्हें ही मैं सदा अपना सर्वोत्कृष्ट देवता मानती हूँ। पिताजी मुझे जिसको सौंप देंगे, वही मेरा पति होगा। कुमारावस्थामें पिता, जवानीमें पति और बुढ़ापेमें पुत्र रक्षा करता है। अतः स्त्रीको कभी स्वतन्त्र नहीं रहना चाहिये। धर्मिष्ठ राजेन्द्र! मैं अपने तपस्वी पिताकी अवहेलना करके अधर्मपूर्वक पतिका वरण कैसे कर सकती हूँ?
दुष्यन्त उवाच
मा मैवं वद सुश्रोणि तपोराशिं दयात्मकम् ।
**दुष्यन्त बोले—**सुन्दरी! ऐसा न कहो। तपोराशि महात्मा कण्व बड़े ही दयालु हैं।
शकुन्तलोवाच
मन्युप्रहरणा विप्रा न विप्राः शस्त्रपाणयः ॥
अग्निर्दहति तेजोभिः सूर्यो दहति रश्मिभिः ।
राजा दहति दण्डेन ब्राह्मणो मन्युना दहेत् ॥
क्रोधितो मन्युना हन्ति वज्रपाणिरिवासुरान् ।)
**शकुन्तलाने कहा—**राजन्! ब्राह्मण क्रोधके द्वारा ही प्रहार करते हैं। वे हाथमें लोहेका हथियार नहीं धारण करते। अग्नि अपने तेजसे, सूर्य अपनी किरणोंसे, राजा दण्डसे और ब्राह्मण क्रोधसे दग्ध करते हैं। कुपित ब्राह्मण अपने क्रोधसे अपराधीको वैसे ही नष्ट कर देता है, जैसे वज्रधारी इन्द्र असुरोंको।
दुष्यन्त उवाच
इच्छामि त्वां वरारोहे भजमानामनिन्दिते ।
त्वदर्थं मां स्थितं विद्धि त्वद्गतं हि मनो मम ॥ ६ ॥
**दुष्यन्त बोले—**वरारोहे! तुम्हारा शील और स्वभाव प्रशंसाके योग्य है। मैं चाहता हूँ, तुम मुझे स्वेच्छासे स्वीकार करो। मैं तुम्हारे लिये ही यहाँ ठहरा हूँ। मेरा मन तुममें ही लगा हुआ है ॥ ६ ॥
आत्मनो बन्धुरात्मैव गतिरात्मैव चात्मनः ।
आत्मनो मित्रमात्मैव तथाऽऽत्मा चात्मनः पिता ।
आत्मनैवात्मनो दानं कर्तुमर्हसि धर्मतः ॥ ७ ॥
आत्मा ही अपना बन्धु है। आत्मा ही अपना आश्रय है। आत्मा ही अपना मित्र है और वही अपना पिता है, अतः तुम स्वयं ही धर्मपूर्वक आत्मसमर्पण करनेयोग्य हो ॥ ७ ॥
अष्टावेव समासेन विवाहा धर्मतः स्मृताः ।