Skip to content
BharatKosha
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,256 pages

Page 552 of 2256

Read in context
Page 552

विश्वामित्रके प्रपितामह थे। कुशके बलवान् पुत्रका नाम कुशनाभ था। वे बड़े धर्मात्मा थे। राजन्! कुशनाभके पुत्र गाधि हुए और गाधिसे विश्वामित्रका जन्म हुआ। ऐसे कुलीन महर्षि मेरे पिता हैं और मेनका मेरी श्रेष्ठ माता है। सा मां हिमवतः प्रस्थे सुषुवे मेनकाप्सराः । अवकीर्य च मां याता परात्मजमिवासती ॥ ७० ॥ 'उस मेनका अप्सराने हिमालयके शिखरपर मुझे जन्म दिया; किंतु वह असद् व्यवहार करनेवाली अप्सरा मुझे परायी संतानकी तरह वहीं छोड़कर चली गयी ।। ७० ।। (पक्षिणः पुण्यवन्तस्ते सहिता धर्मतस्तदा । पक्षैस्तैरभिगुप्ता च तस्मादस्मि शकुन्तला ॥ ततोऽहमृषिणा दृष्टा काश्यपेन महात्मना । जलार्थमग्निहोत्रस्य गतं दृष्ट्वा तु पक्षिणः ॥ न्यासभूतामिव मुनेः प्रददुर्मां दयावतः । स मारणिमिवादाय स्वमाश्रममुपागमत् ॥ सा वै सम्भाविता राजन्ननुक्रोशान्महर्षिणा । तेनैव स्वसुतेवाहं राजन् वै परमर्षिणा ॥ विश्वामित्रसुता चाहं वर्धिता मुनिना नृप । यौवने वर्तमानां च दृष्टवानसि मां नृप ॥ आश्रमे पर्णशालायां कुमारीं विजने वने । धात्रा प्रचोदितां शून्ये पित्रा विरहितां मिथः ॥ वाग्भिस्त्वं सूनृताभिर्मामपत्यार्थमचूचुदः । अकार्षीस्त्वाश्रमे वासं धर्मकामार्थनिश्चितम् ॥ गान्धर्वेण विवाहेन विधिना पाणिमग्रहीः । साहं कुलं च शीलं च सत्यवादित्वमात्मनः ॥ स्वधर्मं च पुरस्कृत्य त्वामद्य शरणं गता । तस्मान्नार्हसि संश्रुत्य तथेति वितथं वचः ॥ स्वधर्मं पृष्ठतः कृत्वा परित्यक्तुमुपस्थिताम् । त्वन्नाथां लोकनाथस्त्वं नार्हसि त्वमनागसम् ॥)

'वे पक्षी भी पुण्यवान् हैं, जिन्होंने एक साथ आकर उस समय धर्मपूर्वक अपने पंखोंसे मेरी रक्षा की। शकुन्तों (पक्षियों)-ने मेरी रक्षा की, इसलिये मेरा नाम शकुन्तला हो गया। तदनन्तर महात्मा कश्यपनन्दन कण्वकी दृष्टि मुझपर पड़ी। वे अग्निहोत्रके लिये जल लानेके हेतु उधर गये हुए थे। उन्हें देखकर पक्षियोंने उन दयालु महर्षिको मुझे धरोहरकी भाँति सौंप दिया। वे मुझे अरणी (शमी)-की भाँति लेकर अपने आश्रमपर आये। राजन्! महर्षिने कृपापूर्वक अपनी पुत्रीके समान मेरा पालन-पोषण किया। नरेश्वर! इस प्रकार मैं