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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,256 pages

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सत्यके समान कोई धर्म नहीं है। सत्यसे उत्तम कुछ भी नहीं है और झूठसे बढ़कर तीव्रतर पाप इस जगत्में दूसरा कोई नहीं है ।। १०५ ।। राजन् सत्यं परं ब्रह्म सत्यं च समयः परः । मा त्याक्षीः समयं राजन् सत्यं संगतमस्तु ते ।। १०६ ।। राजन्! सत्य परब्रह्म परमात्माका स्वरूप है। सत्य सबसे बड़ा नियम है। अतः महाराज! आप अपनी सत्य प्रतिज्ञाको न छोड़िये। सत्य आपका जीवनसंगी हो ।। १०६ ।। अनृते चेत् प्रसङ्गस्ते श्रद्धधासि न चेत् स्वयम् । आत्मना हन्त गच्छामि त्वादृशे नास्ति संगतम् ।। १०७ ।। यदि आपकी झूठमें ही आसक्ति है और मेरी बातपर श्रद्धा नहीं करते हैं तो मैं स्वयं ही चली जाती हूँ। आप-जैसेके साथ रहना मुझे उचित नहीं है ।। १०७ ।। (पुत्रत्वे शङ्कमानस्य बुद्धिर्ज्ञापकदीपना । गतिः स्वरः स्मृतिः सत्त्वं शीलविज्ञानविक्रमाः ।। धृष्णुप्रकृतिभावौ च आवर्ता रोमराजयः । समा यस्य यतः स्युस्ते तस्य पुत्रो न संशयः ।। सादृश्येनोद्धृतं बिम्बं तव देहाद् विशाम्पते । तातेति भाषमाणं वै मा स्म राजन् वृथा कृथाः ।।) यह मेरा पुत्र है या नहीं, ऐसा संदेह होनेपर बुद्धि ही इसका निर्णय करनेवाली अथवा इस रहस्यपर प्रकाश डालनेवाली है। चाल-ढाल, स्वर, स्मरणशक्ति, उत्साह, शील-स्वभाव, विज्ञान, पराक्रम, साहस, प्रकृतिभाव, आवर्त (भँवर) तथा रोमावली—जिसकी ये सब वस्तुएँ जिससे सर्वथा मिलती-जुलती हों, वह उसीका पुत्र है, इसमें संशय नहीं है। राजन्! आपके शरीरसे पूर्ण समानता लेकर यह बिम्बकी भाँति प्रकट हुआ है और आपको 'तात' कहकर पुकार रहा है। आप इसकी आशा न तोड़ें। त्वामृतेऽपि हि दुष्यन्त शैलराजावतंसकाम् । चतुरन्तामिमामुर्वीं पुत्रो मे पालयिष्यति ।। १०८ ।। महाराज दुष्यन्त! मैं एक बात कहे देती हूँ, आपके सहयोगके बिना भी मेरा यह पुत्र चारों समुद्रोंसे घिरी हुई गिरिराज हिमालयरूपी मुकुटसे सुशोभित समूची पृथ्वीका शासन करेगा ।। १०८ ।। (शकुन्तले तव सुतश्चक्रवर्ती भविष्यति । एवमुक्तो महेन्द्रेण भविष्यति न चान्यथा ।। साक्षित्वे बहवोऽप्युक्ता देवदूतादयो मताः । न ब्रुवन्ति यथा सत्यमुताहोऽप्यनृतं किल ।। असाक्षिणी मन्दभाग्या गमिष्यामि यथाऽऽगतम् ।)