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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,256 pages

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करता है। तुमने ही इस गर्भका आधान किया था। शकुन्तला सत्य कहती है। जाया (पत्नी) दो भागोंमें विभक्त हुए पतिके अपने ही शरीरको पुत्ररूपमें उत्पन्न करती है ॥ ११०—११२ ॥

तस्माद् भरस्व दुष्यन्त पुत्रं शाकुन्तलं नृप ।
अभूतिरेषा यत् त्यक्त्वा जीवेज्जीवन्तमात्मजम् ॥ ११३ ॥
‘इसलिये राजा दुष्यन्त! तुम शकुन्तलासे उत्पन्न हुए अपने पुत्रका पालन-पोषण करो। अपने जीवित पुत्रको त्यागकर जीवन धारण करना बड़े दुर्भाग्यकी बात है ॥ ११३ ॥

शाकुन्तलं महात्मानं दौष्यन्तिं भर पौरव ।
भर्तव्योऽयं त्वया यस्मादस्माकं वचनादपि ॥ ११४ ॥
तस्माद् भवत्वयं नाम्ना भरतो नाम ते सुतः ।
‘पौरव! यह महामना बालक शकुन्तला और दुष्यन्त दोनोंका पुत्र है। हम देवताओंके कहनेसे तुम इसका भरण-पोषण करोगे, इसलिये तुम्हारा यह पुत्र भरतके नामसे विख्यात होगा' ॥ ११४ १/२ ॥

(एवमुक्त्वा ततो देवा ऋषयश्च तपोधनाः ।
पतिव्रतेति संहृष्टाः पुष्पवृष्टिं ववर्षिरे ॥)
तच्छ्रुत्वा पौरवो राजा व्याहृतं त्रिदिवौकसाम् ॥ ११५ ॥
पुरोहितममात्यांश्च सम्प्रहृष्टोऽब्रवीदिदम् ।
शृण्वन्त्वेतद् भवन्तोऽस्य देवदूतस्य भाषितम् ॥ ११६ ॥
(वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्!) ऐसा कहकर देवता तथा तपस्वी ऋषि शकुन्तलाको पतिव्रता बतलाते हुए उसपर फूलोंकी वर्षा करने लगे। पूरुवंशी राजा दुष्यन्त देवताओंकी यह बात सुनकर बड़े प्रसन्न हुए और पुरोहित तथा मन्त्रियोंसे इस प्रकार बोले—‘आपलोग इस देवदूतका कथन भलीभाँति सुन लें ॥ ११५-११६ ॥

अहं चाप्येवमेवैनं जानामि स्वयमात्मजम् ।
यद्यहं वचनादस्या गृह्णीयामि ममात्मजम् ॥ ११७ ॥
भवेद्धि शङ्क्यो लोकस्य नैव शुद्धो भवेदियम् ।
‘मैं भी अपने इस पुत्रको इसी रूपमें जानता हूँ। यदि केवल शकुन्तलाके कहनेसे मैं इसे ग्रहण कर लेता, तो सब लोग इसपर संदेह करते और यह बालक विशुद्ध नहीं माना जाता' ॥ ११७ १/२ ॥

वैशम्पायन उवाच
तं विशोध्य तदा राजा देवदूतेन भारत ।
हृष्टः प्रमुदितश्चापि प्रतिजग्राह तं सुतम् ॥ ११८ ॥