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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,256 pages

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विश्वामित्रने इसे जन्म दिया और महात्मा कण्वने पाला है। तुम शकुन्तलापर कृपादृष्टि रखो।' पुत्रकी यह बात सुनकर राजमाता रथन्तर्याने पौत्रको हृदयसे लगा लिया और अपने चरणोंमें पड़ी हुई शकुन्तलाको दोनों भुजाओंमें भरकर वे हर्षके आँसू बहाने लगीं। साथ ही पौत्रके शुभ लक्षणोंकी ओर संकेत करती हुई बोलीं— 'विशालाक्षि! तेरा पुत्र चक्रवर्ती सम्राट् होगा। तेरे पतिको तीनों लोकोंपर विजय प्राप्त हो। सुन्दरि! तुम्हें सदा दिव्य भोग प्राप्त होते रहें।' यह कहकर राजमाता रथन्तर्या अत्यन्त हर्षसे विभोर हो उठीं। उस समय राजाने शास्त्रोक्त विधिके अनुसार समस्त आभूषणोंसे विभूषित शकुन्तलाको पटरानीके पदपर अभिषिक्त करके ब्राह्मणों तथा सैनिकोंको बहुत धन अर्पित किया।

दुष्यन्तस्तु तदा राजा पुत्रं शाकुन्तलं तदा । भरतं नामतः कृत्वा यौवराज्येऽभ्यषेचयत् ॥ १२६ ॥

तदनन्तर महाराज दुष्यन्तने शकुन्तलाकुमारका नाम भरत रखकर उसे युवराजके पदपर अभिषिक्त कर दिया ॥ १२६ ॥

(भरते भारमावेश्य कृतकृत्योऽभवन्नृपः । ततो वर्षशतं पूर्णं राज्यं कृत्वा नराधिपः ॥ कृत्वा दानानि दुष्यन्तः स्वर्गलोकमुपैयिवान् ।)

फिर भरतको राज्यका भार सौंपकर महाराज दुष्यन्त कृतकृत्य हो गये। वे पूरे सौ वर्षोंतक राज्य भोगकर विविध प्रकारके दान दे अन्तमें स्वर्गलोक सिधारे।

तस्य तत् प्रथितं चक्रं प्रावर्तत महात्मनः । भास्वरं दिव्यमजितं लोकसंनादनं महत् ॥ १२७ ॥

महात्मा राजा भरतका विख्यात चक्र* सब ओर घूमने लगा। वह अत्यन्त प्रकाशमान, दिव्य और अजेय था। वह महान् चक्र अपनी भारी आवाजसे सम्पूर्ण जगत्को प्रतिध्वनित करता चलता था ॥ १२७ ॥

स विजित्य महीपालांश्चकार वशवर्तिनः । चचार च सतां धर्मं प्राप चानुत्तमं यशः ॥ १२८ ॥

उन्होंने सब राजाओंको जीतकर अपने अधीन कर लिया तथा सत्पुरुषोंके धर्मका पालन और उत्तम यशका उपार्जन किया ॥ १२८ ॥

स राजा चक्रवर्त्यासीत् सार्वभौमः प्रतापवान् । ईजे च बहुभिर्यज्ञैर्यथा शक्रो मरुत्पतिः ॥ १२९ ॥

महाराज भरत समस्त भूमण्डलमें विख्यात, प्रतापी एवं चक्रवर्ती सम्राट् थे। उन्होंने देवराज इन्द्रकी भाँति बहुत-से यज्ञोंका अनुष्ठान किया ॥ १२९ ॥

याजयामास तं कण्वो विधिवद् भूरिदक्षिणम् । श्रीमान् गोविततं नाम वाजिमेधमवाप सः । यस्मिन् सहस्रं पद्मानां कण्वाय भरतो ददौ ॥ १३० ॥