Skip to content
BharatKosha
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,256 pages

Page 568 of 2256

Read in context
Page 568

षट् सुता जज्ञिरे चैलादायुर्धीमानमावसुः ॥ २४ ॥ दृढायुश्च वनायुश्च शतायुश्चोर्वशीसुताः । नहुषं वृद्धशर्माणं रजिं गयमनेनसम् ॥ २५ ॥ स्वर्भानवीसुतानेतानायोः पुत्रान् प्रचक्षते । आयुषो नहुषः पुत्रो धीमान् सत्यपराक्रमः ॥ २६ ॥ राजा पुरूरवा लोभसे अभिभूत थे और बलके घमंडमें आकर अपनी विवेक-शक्ति खो बैठे थे। वे शोभाशाली नरेश ही गन्धर्वलोकमें स्थित और विधिपूर्वक स्थापित त्रिविध अग्नियोंको उर्वशीके साथ इस धरातलपर लाये थे। इलानन्दन पुरूरवाके छः पुत्र उत्पन्न हुए, जिनके नाम इस प्रकार हैं—आयु, धीमान्, अमावसु, दृढायु, वनायु और शतायु। ये सभी उर्वशीके पुत्र हैं। उनमेंसे आयुके स्वर्भानुकुमारीके गर्भसे उत्पन्न पाँच पुत्र बताये जाते हैं—नहुष, वृद्धशर्मा, रजि, गय तथा अनेना। आयुर्नन्दन नहुष बड़े बुद्धिमान् और सत्य-पराक्रमी थे ॥ २३-२६ ॥

राज्यं शशास सुमहद् धर्मेण पृथिवीपते । पितॄन् देवानृषीन् विप्रान् गन्धर्वोरगराक्षसान् ॥ २७ ॥ नहुषः पालयामास ब्रह्मक्षत्रमथो विशः । स हत्वा दस्युसंघातानृषीन् करमदापयत् ॥ २८ ॥ पृथिवीपते! उन्होंने अपने विशाल राज्यका धर्मपूर्वक शासन किया। पितरों, देवताओं, ऋषियों, ब्राह्मणों, गन्धर्वों, नागों, राक्षसों तथा ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंका भी पालन किया। राजा नहुषने झुंड-के-झुंड डाकुओं और लुटेरोंका वध करके ऋषियोंको भी कर देनेके लिये विवश किया ॥ २७-२८ ॥

पशुवच्चैव तान् पृष्ठे वाहयामास वीर्यवान् । कारयामास चेन्द्रत्वमभिभूय दिवौकसः ॥ २९ ॥ तेजसा तपसा चैव विक्रमेणौजसा तथा । यतिं ययातिं संयातिमायातिमयतिं ध्रुवम् ॥ ३० ॥ नहुषो जनयामास षट् सुतान् प्रियवादिनः । यतिस्तु योगमास्थाय ब्रह्मभूतोऽभवन्मुनिः ॥ ३१ ॥ अपने इन्द्रत्वकालमें पराक्रमी नहुषने महर्षियोंको पशुकी तरह वाहन बनाकर उनकी पीठपर सवारी की थी। उन्होंने तेज, तप, ओज और पराक्रमद्वारा समस्त देवताओंको तिरस्कृत करके इन्द्रपदका उपभोग किया था। राजा नहुषने छः प्रियवादी पुत्रोंको जन्म दिया, जिनके नाम इस प्रकार हैं—यति, ययाति, संयाति, आयाति, अयति और ध्रुव। इनमें यति योगका आश्रय लेकर ब्रह्मभूत मुनि हो गये थे ॥ २९—३१ ॥

ययातिर्नाहुषः सम्राडासीत् सत्यपराक्रमः । स पालयामास महीमीजे च बहुभिर्मखैः ॥ ३२ ॥