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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,256 pages

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Page 574

तान् पुनर्जीवयामास काव्यो विद्याबलाश्रयात् । ततस्ते पुनरुत्थाय योधयांचक्रिरे सुरान् ॥ ८ ॥ उसमें विजय पानेकी इच्छासे देवताओंने अंगिरा मुनिके पुत्र बृहस्पतिका पुरोहितके पदपर वरण किया और दैत्योंने शुक्राचार्यको पुरोहित बनाया। वे दोनों ब्राह्मण सदा आपसमें बहुत लाग-डाट रखते थे। देवताओंने उस युद्धमें आये हुए जिन दानवोंको मारा था, उन्हें शुक्राचार्यने अपनी संजीवनी विद्याके बलसे पुनः जीवित कर दिया। अतः वे पुनः उठकर देवताओंसे युद्ध करने लगे ॥ ६-८ ॥ असुरास्तु निजघ्नुर्यान् सुरान् समरमूर्धनि । न तान् संजीवयामास बृहस्पतिरुदारधीः ॥ ९ ॥ परंतु असुरोंने युद्धके मुहानेपर जिन देवताओंको मारा था, उन्हें उदारबुद्धि बृहस्पति जीवित न कर सके ॥ ९ ॥ न हि वेद स तां विद्यां यां काव्यो वेत्ति वीर्यवान् । संजीविनीं ततो देवा विषादमगमन् परम् ॥ १० ॥ क्योंकि शक्तिशाली शुक्राचार्य जिस संजीविनी विद्याको जानते थे, उसका ज्ञान बृहस्पतिको नहीं था। इससे देवताओंको बड़ा विषाद हुआ ॥ १० ॥ ते तु देवा भयोद्विग्नाः काव्यादुशनसस्तदा । ऊचुः कचमुपागम्य ज्येष्ठं पुत्रं बृहस्पतेः ॥ ११ ॥ इससे देवता शुक्राचार्यके भयसे उद्विग्न हो उस समय बृहस्पतिके ज्येष्ठ पुत्र कचके पास जाकर बोले— ॥ ११ ॥ भजमानान् भजस्वास्मान् कुरु नः साह्यमुत्तमम् । या सा विद्या निवसति ब्राह्मणेऽमिततेजसि ॥ १२ ॥ शुक्रे तामाहर क्षिप्रं भागभाङ् नो भविष्यसि । वृषपर्वसमीपे हि शक्यो द्रष्टुं त्वया द्विजः ॥ १३ ॥ 'ब्रह्मन्! हम आपके सेवक हैं। आप हमें अपनाइये और हमारी उत्तम सहायता कीजिये। अमिततेजस्वी ब्राह्मण शुक्राचार्यके पास जो मृतसंजीवनी विद्या है, उसे शीघ्र सीखकर यहाँ ले आइये। इससे आप हम देवताओंके साथ यज्ञमें भाग प्राप्त कर सकेंगे। राजा वृषपर्वाके समीप आपको विप्रवर शुक्राचार्यका दर्शन हो सकता है' ॥ १२-१३ ॥ रक्षते दानवांस्तत्र न स रक्षत्यदानवान् । तमाराधयितुं शक्तो भवान् पूर्ववयाः कविम् ॥ १४ ॥ 'वहाँ रहकर वे दानवोंकी रक्षा करते हैं। जो दानव नहीं हैं, उनकी रक्षा नहीं करते। आपकी अभी नयी अवस्था है, अतः आप शुक्राचार्यकी आराधना (करके उन्हें प्रसन्न) करनेमें समर्थ हैं' ॥ १४ ॥ देवयानीं च दयितां सुतां तस्य महात्मनः ।