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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,256 pages

Page 580 of 2256

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Page 580

‘मेरे इतना कहते ही दानवोंने मुझे मार डाला और मेरे शरीरको चूर्ण करके कुत्ते-सियारोंको बाँट दिया। फिर वे सुखपूर्वक अपने घर चले गये॥ ३८॥ आहूतो विद्यया भद्रे भार्गवेण महात्मना । त्वत्समीपमिहायातः कथंचित् समजीवितः ॥ ३९ ॥ ‘भद्रे! फिर महात्मा भार्गवने जब विद्याका प्रयोग करके मुझे बुलाया है, तब किसी प्रकारसे पूर्ण जीवन लाभ करके यहाँ तुम्हारे पास आ सका हूँ’॥ ३९॥ हतोऽहमिति चाचख्यौ पृष्टो ब्राह्मणकन्यया । स पुनर्देवयान्योक्तः पुष्पाहारो यदृच्छया ॥ ४० ॥ इस प्रकार ब्राह्मणकन्याके पूछनेपर कचने उससे अपने मारे जानेकी बात बतायी। तदनन्तर पुनः देवयानीने एक दिन अकस्मात् कचको फूल लानेके लिये कहा॥ ४०॥ वनं ययौ कचो विप्रो ददृशुर्दानवाश्च तम् । पुनस्तं पेषयित्वा तु समुद्राम्भस्यमिश्रयन् ॥ ४१ ॥ विप्रवर कच इसके लिये वनमें गये। वहाँ दानवोंने उन्हें देख लिया और फिर उन्हें पीसकर समुद्रके जलमें घोल दिया॥ ४१॥ चिरं गतं पुनः कन्या पित्रे तं संन्यवेदयत् । विप्रेण पुनराहूतो विद्यया गुरुदेहजः । पुनरावृत्य तद् वृत्तं न्यवेदयत तद् यथा ॥ ४२ ॥ जब उसके लौटनेमें विलम्ब हुआ, तब आचार्यकन्याने पितासे पुनः यह बात बतायी। विप्रवर शुक्राचार्यने कचका पुनः संजीवनी विद्याद्वारा आवाहन किया। इससे बृहस्पतिपुत्र कच पुनः वहाँ आ पहुँचे और उनके साथ असुरोंने जो बर्ताव किया था, वह बताया॥ ४२॥ ततस्तृतीयं हत्वा तं दग्ध्वा कृत्वा च चूर्णशः । प्रायच्छन् ब्राह्मणायैव सुरायामसुरास्तदा ॥ ४३ ॥ तत्पश्चात् असुरोंने तीसरी बार कचको मारकर आगमें जलाया और उनकी जली हुई लाशका चूर्ण बनाकर मदिरामें मिला दिया तथा उसे ब्राह्मण शुक्राचार्यको ही पिला दिया॥ ४३॥ देवयान्यथ भूयोऽपि पितरं वाक्यमब्रवीत् । पुष्पाहारः प्रेषणकृत् कचस्तात न दृश्यते ॥ ४४ ॥ अब देवयानी पुनः अपने पितासे यह बात बोली—‘पिताजी! कच मेरे कहनेपर प्रत्येक कार्य पूर्ण कर दिया करते हैं। आज मैंने उन्हें फूल लानेके लिये भेजा था, परंतु अभीतक वे दिखायी नहीं दिये॥ ४४॥ व्यक्तं हतो मृतो वापि कचस्तात भविष्यति । तं विना न च जीवेयं कचं सत्यं ब्रवीमि ते ॥ ४५ ॥