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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,256 pages

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कचने कहा— उत्तम व्रतका आचरण करनेवाली सुन्दरी! तुम मुझे ऐसे कार्यमें लगा रही हो, जिसमें लगाना कदापि उचित नहीं है। शुभे! तुम मेरे ऊपर प्रसन्न होओ। तुम मेरे लिये गुरुसे भी बढ़कर गुरुतर हो। विशाल नेत्र तथा चन्द्रमाके समान मुखवाली भामिनि! शुक्राचार्यके जिस उदरमें तुम रह चुकी हो, उसीमें मैं भी रहा हूँ। इसलिये भद्रे! धर्मकी दृष्टिसे तुम मेरी बहिन हो। अतः सुमध्यमे! मुझसे ऐसी बात न कहो। कल्याणी! मैं तुम्हारे यहाँ बड़े सुखसे रहा हूँ। तुम्हारे प्रति मेरे मनमें तनिक भी रोष नहीं है ।। १२—१४ ।। आपृच्छे त्वां गमिष्यामि शिवमाशंस मे पथि । अविरोधेन धर्मस्य स्मर्तव्योऽस्मि कथान्तरे । अप्रमत्तोत्थिता नित्यमाराधय गुरुं मम ।। १५ ।। अब मैं जाऊँगा, इसलिये तुमसे पूछता हूँ—तुम्हारी आज्ञा चाहता हूँ, आशीर्वाद दो कि मार्गमें मेरा मंगल हो। धर्मकी अनुकूलता रखते हुए बातचीतके प्रसंगमें कभी मेरा भी स्मरण कर लेना और सदा सावधान एवं सजग रहकर मेरे गुरुदेवकी सेवामें लगी रहना ।। १५ ।।

<div align="center">**देवयान्युवाच**</div>

यदि मां धर्मकामार्थे प्रत्याख्यास्यसि याचितः । ततः कच न ते विद्या सिद्धिमेषा गमिष्यति ।। १६ ।। देवयानी बोली— कच! मैंने धर्मानुकूल कामके लिये आपसे प्रार्थना की है। यदि आप मुझे ठुकरा देंगे, तो आपकी यह संजीवनी विद्या सिद्ध नहीं हो सकेगी ।। १६ ।।

<div align="center">**कच उवाच**</div>

गुरुपुत्रीति कृत्वाहं प्रत्याचक्षे न दोषतः । गुरुणा चाननुज्ञातः काममेवं शपस्व माम् ।। १७ ।। कचने कहा— देवयानी! गुरुपुत्री समझकर ही मैंने तुम्हारे अनुरोधको टाल दिया है; तुममें कोई दोष देखकर नहीं। गुरुजीने भी इसके विषयमें मुझे कोई आज्ञा नहीं दी है। तुम्हारी जैसी इच्छा हो, मुझे शाप दे दो ।। १७ ।। आर्षं धर्मं ब्रुवाणोऽहं देवयानि यथा त्वया । शप्तो नार्होऽस्मि शापस्य कामतोऽद्य न धर्मतः ।। १८ ।। तस्माद् भवत्या यः कामो न तथा स भविष्यति । ऋषिपुत्रो न ते कश्चिज्जातु पाणिं ग्रहीष्यति ।। १९ ।। बहिन! मैं आर्ष धर्मकी बात बता रहा था। इस दशामें तुम्हारे द्वारा शाप पानेके योग्य नहीं था। तुमने मुझे धर्मके अनुसार नहीं, कामके वशीभूत होकर आज शाप दिया है, इसलिये तुम्हारे मनमें जो कामना है, वह पूरी नहीं होगी। कोई भी ऋषिपुत्र (ब्राह्मणकुमार) कभी तुम्हारा पाणिग्रहण नहीं करेगा ।। १८-१९ ।। फलिष्यति न ते विद्या यत् त्वं मामात्थ तत् तथा ।