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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,256 pages

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Page 608

तत् तेऽहं सम्प्रदास्यामि यदि वापि हि दुर्लभम् ।। १५ ।। **वृषपर्वा बोले—**पवित्र मुसकानवाली देवयानी! तुम जिस वस्तुको पाना चाहती हो, वह यदि दुर्लभ हो तो भी तुम्हें अवश्य दूँगा ।। १५ ।।

देवयान्युवाच

दासीं कन्यासहस्रेण शर्मिष्ठामभिकामये । अनु मां तत्र गच्छेत् सा यत्र दद्याच्च मे पिता ।। १६ ।। **देवयानीने कहा—**मैं चाहती हूँ, शर्मिष्ठा एक हजार कन्याओंके साथ मेरी दासी होकर रहे और पिताजी जहाँ मेरा विवाह करें, वहाँ भी वह मेरे साथ जाय ।। १६ ।।

वृषपर्वोवाच

उत्तिष्ठ त्वं गच्छ धात्रि शर्मिष्ठां शीघ्रमानय । यं च कामयते कामं देवयानी करोतु तम् ।। १७ ।। **यह सुनकर वृषपर्वाने धायसे कहा—**धात्री! तुम उठो, जाओ और शर्मिष्ठाको शीघ्र बुला लाओ एवं देवयानीकी जो कामना हो, उसे वह पूर्ण करे ।। १७ ।। (त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् । ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ॥) कुलके हितके लिये एक मनुष्यको त्याग दे। गाँवके भलेके लिये एक कुलको छोड़ दे। जनपदके लिये एक गाँवकी उपेक्षा कर दे और आत्मकल्याणके लिये सारी पृथ्वीको त्याग दे।

वैशम्पायन उवाच

ततो धात्री तत्र गत्वा शर्मिष्ठां वाक्यमब्रवीत् । उत्तिष्ठ भद्रे शर्मिष्ठे ज्ञातीनां सुखमावह ।। १८ ।। **वैशम्पायनजी कहते हैं—**तब धायने शर्मिष्ठाके पास जाकर कहा—'भद्रे शर्मिष्ठे! उठो और अपने जाति-भाइयोंको सुख पहुँचाओ ।। १८ ।। त्यजति ब्राह्मणः शिष्यान् देवयान्या प्रचोदितः । सा यं कामयते कामं स कार्योऽद्य त्वयानघे ।। १९ ।। 'पापरहित राजकुमारी! आज बाबा शुक्राचार्य देवयानीके कहनेसे अपने शिष्यों—यजमानोंको त्याग रहे हैं। अतः देवयानीकी जो कामना हो, वह तुम्हें पूर्ण करनी चाहिये' ।। १९ ।।

शर्मिष्ठोवाच

यं सा कामयते कामं करवाण्यहमद्य तम् । यद्येवमाह्वयेच्छुक्रो देवयानीकृते हि माम् ।