Skip to content
BharatKosha
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,256 pages

Page 615 of 2256

Read in context
Page 615

दुराधर्षतरो विप्र इत्यात्थ पुरुषर्षभ ॥ २४ ॥
देवयानीने कहा— पुरुषप्रवर! ब्राह्मण विषधर सर्प और सब ओरसे प्रज्वलित होनेवाली अग्निसे भी दुर्धर्ष एवं भयंकर है, यह बात आपने कैसे कही? ॥ २४ ॥

ययातिरुवाच
एकमाशीविषो हन्ति शस्त्रेणैकश्च वध्यते ।
हन्ति विप्रः सराष्ट्राणि पुराण्यपि हि कोपितः ॥ २५ ॥
दुराधर्षतरो विप्रस्तस्माद् भीरु मतो मम ।
अतोऽदत्तां च पित्रा त्वां भद्रे न विवहाम्यहम् ॥ २६ ॥
ययाति बोले— भद्रे! सर्प एकको ही मारता है, शस्त्रसे भी एक ही व्यक्तिका वध होता है; परंतु क्रोधमें भरा हुआ ब्राह्मण समस्त राष्ट्र और नगरका भी नाश कर देता है। भीरु! इसलिये मैं ब्राह्मणको अधिक दुर्धर्ष मानता हूँ। अतः जबतक आपके पिता आपको मेरे हवाले न कर दें, तबतक मैं आपसे विवाह नहीं करूँगा ॥ २५-२६ ॥

देवयान्युवाच
दत्तां वहस्व तन्मा त्वं पित्रा राजन् वृतो मया ।
अयाचतो भयं नास्ति दत्तां च प्रतिगृह्णतः ॥ २७ ॥
(तिष्ठ राजन् मुहूर्तं तु प्रेषयिष्याम्यहं पितुः ।
देवयानीने कहा— राजन्! मैंने आपका वरण कर लिया है, अब आप मेरे पिताके देनेपर ही मुझसे विवाह करें। आप स्वयं तो उनसे याचना करते नहीं हैं; उनके देनेपर ही मुझे स्वीकार करेंगे। अतः आपको उनके कोपका भय नहीं है। राजन्! दो घड़ी ठहर जाइये। मैं अभी पिताके पास संदेश भेजती हूँ ॥ २७ ॥

गच्छ त्वं धात्रिके शीघ्रं ब्रह्मकल्पमिहानय ॥
स्वयंवरे वृतं शीघ्रं निवेदय च नहुषम् ॥)
धाय! शीघ्र जाओ और मेरे ब्रह्मतुल्य पिताको यहाँ बुला ले आओ। उनसे यह भी कह देना कि देवयानीने स्वयंवरकी विधिसे नहुषनन्दन राजा ययातिका पतिरूपमें वरण किया है।

वैशम्पायन उवाच
त्वरितं देवयान्याथ संदिष्टं पितुरात्मनः ।
सर्वं निवेदयामास धात्री तस्मै यथातथम् ॥ २८ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! इस प्रकार देवयानीने तुरंत धायको भेजकर अपने पिताको संदेश दिया। धायने जाकर शुक्राचार्यसे सब बातें ठीक-ठीक बता दीं ॥ २८ ॥
श्रुत्वैव च स राजानं दर्शयामास भार्गवः ।