महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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कस्यैते दारका राजन् देवपुत्रोपमाः शुभाः । वर्चसा रूपतश्चैव सदृशा मे मतास्तव ।। १३ ।। देवयानीने पूछा—राजन्! ये देवबालकोंके तुल्य शुभ लक्षणसम्पन्न कुमार किसके हैं? तेज और रूपमें तो ये मुझे आपहीके समान जान पड़ते हैं ।। १३ ।।
वैशम्पायन उवाच
एवं पृष्ट्वा तु राजानं कुमारान् पर्यपृच्छत । वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! राजासे इस प्रकार पूछकर उसने उन कुमारोंसे प्रश्न किया ।। १३ १/२ ।।
देवयान्युवाच
किं नामधेयं वंशो वः पुत्रकाः कश्च वः पिता । प्रब्रूत मे यथातथ्यं श्रोतुमिच्छामि तं ह्यहम् ।। १४ ।। देवयानीने पूछा—बच्चो! तुम्हारे कुलका क्या नाम है? तुम्हारे पिता कौन हैं? यह मुझे ठीक-ठीक बताओ। मैं तुम्हारे पिताका नाम सुनना चाहती हूँ ।। १४ ।। (एवमुक्ताः कुमारास्ते देवयान्या सुमध्यमा ।) तेऽदर्शयन् प्रदेशिन्या तमेव नृपसत्तमम् । शर्मिष्ठां मातरं चैव तथाऽऽचचक्षुश्च दारकाः ।। १५ ।। सुन्दरी देवयानीके इस प्रकार पूछनेपर उन बालकोंने पिताका परिचय देते हुए तर्जनी अँगुलीसे उन्हीं नृपश्रेष्ठ ययातिको दिखा दिया और शर्मिष्ठाको अपनी माता बताया ।। १५ ।।
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्त्वा सहितास्ते तु राजानमुपचक्रमुः । नाभ्यनन्दत तान् राजा देवयान्यास्तदान्तिके ।। १६ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं—ऐसा कहकर वे सब बालक एक साथ राजाके समीप आ गये; परंतु उस समय देवयानीके निकट राजाने उनका अभिनन्दन नहीं किया—उन्हें गोदमें नहीं उठाया ।। १६ ।।