महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextपहले ही कह दिया था कि तुमने कोई पाप किया है। शर्मिष्ठे! तुमने मेरे अधीन होकर भी मुझे अप्रिय लगनेवाला बर्ताव क्यों किया? तुम फिर उसी असुर-धर्मपर उतर आयीं। मुझसे डरती भी नहीं हो? ॥ १९ ॥
शर्मिष्ठोवाच
यदुक्तमृषिरित्येव तत् सत्यं चारुहासिनि ।
न्यायतो धर्मतश्चैव चरन्ती न बिभेमि ते ॥ २० ॥
**शर्मिष्ठा बोली—**मनोहर मुसकानवाली सखी! मैंने जो ऋषि कहकर अपने स्वामीका परिचय दिया था, सो सत्य ही है। मैं न्याय और धर्मके अनुकूल आचरण करती हूँ, अतः तुमसे नहीं डरती ॥ २० ॥
यदा त्वया वृतो भर्ता वृत एव तदा मया ।
सखीभर्ता हि धर्मेण भर्ता भवति शोभने ॥ २१ ॥
पूज्यासि मम मान्या च ज्येष्ठा च ब्राह्मणी ह्यसि ।
त्वत्तोऽपि मे पूज्यतमो राजर्षिः किं न वेत्थ तत् ॥ २२ ॥
(त्वत्पित्रा गुरुणा मे च सह दत्ते उभे शुभे ।
तव भर्ता च पूज्यश्च पोष्यां पोषयतीह माम् ॥)
जब तुमने पतिका वरण किया था, उसी समय मैंने भी कर लिया। शोभने! जो सखीका स्वामी होता है, वही उसके अधीन रहनेवाली अन्य अविवाहिता सखियोंका भी धर्मतः पति होता है। तुम ज्येष्ठ हो, ब्राह्मणकी पुत्री हो, अतः मेरे लिये माननीय एवं पूजनीय हो; परंतु ये राजर्षि मेरे लिये तुमसे भी अधिक पूजनीय हैं। क्या यह बात तुम नहीं जानतीं? ॥ २१-२२ ॥
शुभे! तुम्हारे पिता और मेरे गुरु (शुक्राचार्यजी)-ने हम दोनोंको एक ही साथ महाराजकी सेवामें समर्पित किया है। तुम्हारे पति और पूजनीय महाराज ययाति भी मुझे पालन करनेयोग्य मानकर मेरा पोषण करते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वा तस्यास्ततो वाक्यं देवयान्यब्रवीदिदम् ।
राजन् नाद्येह वत्स्यामि विप्रियं मे कृतं त्वया ॥ २३ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**शर्मिष्ठाका यह वचन सुनकर देवयानीने कहा—'राजन्! अब मैं यहाँ नहीं रहूँगी। आपने मेरा अत्यन्त अप्रिय किया है' ॥ २३ ॥
सहसोत्पतितां श्यामां दृष्ट्वा तां साश्रुलोचनाम् ।
तूर्णं सकाशं काव्यस्य प्रस्थितां व्यथितस्तदा ॥ २४ ॥
ऐसा कहकर तरुणी देवयानी आँखोंमें आँसू भरकर सहसा उठी और तुरंत ही शुक्राचार्यजीके पास जानेके लिये वहाँसे चल दी। यह देख उस समय राजा ययाति व्यथित