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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,256 pages

Page 706 of 2256

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कुरुने दशार्हकुलकी कन्या शुभांगीसे विवाह किया। उसके गर्भसे विदूर नामक पुत्र हुआ ।। ३९ ।।

विदूरस्तु माधवीमुपयेमे सम्प्रियां नाम । तस्या-मस्य जज्ञे अनश्वा नाम ।। ४० ।।
विदूरने मधुवंशकी कन्या सम्प्रियासे विवाह किया; जिसके गर्भसे अनश्वा नामक पुत्र प्राप्त हुआ ।। ४० ।।

अनश्वा खलु मागधीमुपयेमे अमृतां नाम । तस्यामस्य जज्ञे परिक्षित् ।। ४१ ।।
अनश्वाने मगधराजकुमारी अमृताको अपनी पत्नी बनाया। उसके गर्भसे परिक्षित् नामक पुत्र उत्पन्न हुआ ।। ४१ ।।

परिक्षित् खलु बाहुदामुपयेमे सुयशां नाम । तस्यामस्य जज्ञे भीमसेनः ।। ४२ ।।
परिक्षित्ने बाहुदराजकी पुत्री सुयशाके साथ विवाह किया; जिसके गर्भसे भीमसेन नामक पुत्र हुआ ।। ४२ ।।

भीमसेनः खलु कैकेयीमुपयेमे कुमारीं नाम । तस्यामस्य जज्ञे प्रतिश्रवा नाम ।। ४३ ।।
भीमसेनने केकयदेशकी राजकुमारी कुमारीको अपनी पत्नी बनाया; जिसके गर्भसे प्रतिश्रवाका जन्म हुआ ।। ४३ ।।

प्रतिश्रवसः प्रतीपः खलु । शैब्यामुपयेमे सुनन्दां नाम । तस्यां पुत्रानुत्पादयामास देवापिं शान्तनुं बाह्लीकं चेति ।। ४४ ।।
प्रतिश्रवासे प्रतीप उत्पन्न हुआ। उसने शिबि-देशकी राजकन्या सुनन्दासे विवाह किया और उसके गर्भसे देवापि, शान्तनु तथा बाह्लीक—इन तीन पुत्रोंको जन्म दिया ।। ४४ ।।

देवापिः खलु बाल एवारण्यं विवेश । शान्तनुस्तु महीपालो बभूव ।। ४५ ।।
देवापि बाल्यावस्थामें ही वनको चले गये, अतः शान्तनु राजा हुए ।। ४५ ।।

अत्रानुवंशश्लोको भवति—
यं यं कराभ्यां स्पृशति जीर्णं स सुखमश्नुते । पुनर्युवा च भवति तस्मात् तं शान्तनुं विदुः ।। इति तदस्य शान्तनुत्वम् ।। ४६ ।।
शान्तनुके विषयमें यह अनुवंशश्लोक उपलब्ध होता है—
वे जिस-जिस बूढ़ेको अपने दोनों हाथोंसे छू देते थे, वह बड़े सुख और शान्तिका अनुभव करता था तथा पुनः नौजवान हो जाता था। इसीलिये लोग उन्हें शान्तनुके रूपमें जानने लगे। यही उनके शान्तनु नाम पड़नेका कारण हुआ ।। ४६ ।।

शान्तनुः खलु गङ्गां भागीरथीमुपयेमे । तस्यामस्य जज्ञे देवव्रतो नामः यमाहुर्भीष्ममिति ।। ४७ ।।
शान्तनुने भागीरथी गंगाको अपनी पत्नी बनाया; जिसके गर्भसे उन्हें देवव्रत नामक पुत्र प्राप्त हुआ, जिसे लोग ‘भीष्म’ कहते हैं ।। ४७ ।।

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