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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,256 pages

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प्रतीपकी पत्नीकी कुक्षिमें एक तेजस्वी गर्भका आविर्भाव हुआ, जो शरद्-ऋतुके शुक्ल पक्षमें परम कान्तिमान् चन्द्रमाकी भाँति प्रतिदिन बढ़ने लगा। तदनन्तर दसवाँ मास प्राप्त होनेपर प्रतीपकी महारानीने एक देवोपम पुत्रको जन्म दिया, जो सूर्यके समान प्रकाशमान था। उन बूढ़े राजदम्पतिके यहाँ पूर्वोक्त राजा महाभिष ही पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए ॥ १८ ॥

शान्तस्य जज्ञे संतानस्तस्मादासीत् स शान्तनुः ।
शान्त पिताकी संतान होनेसे वे शान्तनु कहलाये।
(तस्य जातस्य कृत्यानि प्रतीपोऽकारयत् प्रभुः ।
जातकर्मादि विप्रेण वेदोक्तैः कर्मभिस्तदा ॥
शक्तिशाली राजा प्रतीपने उस बालकके आवश्यक कृत्य (संस्कार) करवाये। ब्राह्मण पुरोहितने वेदोक्त क्रियाओंव्दारा उसके जात-कर्म आदि सम्पन्न किये।
नामकर्म च विप्रास्तु चक्रुः परमसत्कृतम् ।
शान्तनोरवनीपाल वेदोक्तैः कर्मभिस्तदा ॥
जनमेजय! तदनन्तर बहुत-से ब्राह्मणोंने मिलकर वेदोक्त विधियोंके अनुसार शान्तनुका नामकरण-संस्कार भी किया।
ततः संवर्धितो राजा शान्तनुर्लोकपालकः ।
स तु लेभे परां निष्ठां प्राप्य धर्मविदां वरः ॥
धनुर्वेदे च वेदे च गतिं स परमां गतः ।
यौवनं चापि सम्प्राप्तः कुमारो वदतां वरः ॥)
तत्पश्चात् बड़े होनेपर राजकुमार शान्तनु लोकरक्षाका कार्य करने लगे। वे धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ थे। उन्होंने धनुर्वेदमें उत्तम योग्यता प्राप्त करके वेदाध्ययनमें भी ऊँची स्थिति प्राप्त की। वक्ताओंमें सर्वश्रेष्ठ वे राजकुमार धीरे-धीरे युवावस्थामें पहुँच गये।

संस्मरंश्चाक्षयाँल्लोकान् विजातान् स्वेन कर्मणा ॥ १९ ॥
पुण्यकर्मकृदेवासीच्छान्तनुः कुरुसत्तमः ।
प्रतीपः शान्तनुं पुत्रं यौवनस्थं ततोऽन्वशात् ॥ २० ॥
अपने सत्कर्मोंव्दारा उपार्जित अक्षय पुण्यलोकोंका स्मरण करके कुरुश्रेष्ठ शान्तनु सदा पुण्यकर्मोंके अनुष्ठानमें ही लगे रहते थे। युवावस्थामें पहुँचे हुए राजकुमार शान्तनुको राजा प्रतीपने आदेश दिया— ॥ १९-२० ॥

पुरा स्त्री मां समभ्यागाच्छान्तनो भूतये तव ।
त्वामाव्रजेद् यदि रहः सा पुत्र वरवर्णिनी ॥ २१ ॥
कामयानाभिरूपाढ्या दिव्या स्त्री पुत्रकाम्यया ।
सा त्वया नानुयोक्तव्या कासि कस्यासि चाङ्गने ॥ २२ ॥