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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,256 pages

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एकस्य च बहूनां च तुमुलं लोमहर्षणम् ॥ २५ ॥ जनमेजय! जल्दबाजीके कारण उन सबके आभूषण और कवच इधर-उधर गिर पड़ते थे। उस समय ऐसा जान पड़ता था, मानो आकाशमण्डलसे तारे टूट-टूटकर गिर रहे हों। कितने ही योद्धाओंके कवच और गहने इधर-उधर बिखर गये। क्रोध और अमर्षके कारण उनकी भौंहें टेढ़ी और आँखें लाल हो गयी थीं। सारथियोंने सुन्दर रथ सजाकर उनमें सुन्दर अश्व जोत दिये थे। उन रथोंपर बैठकर सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न हो हथियार उठाये हुए उन वीरोंने जाते हुए कुरुनन्दन भीष्मजीका पीछा किया। जनमेजय! तदनन्तर उन राजाओं और भीष्मजीका घोर संग्राम हुआ। भीष्मजी अकेले थे और राजालोग बहुत। उनमें रोंगटे खड़े कर देनेवाला भयंकर संग्राम छिड़ गया ॥ २२—२५ ॥ ते त्विषून् साहस्त्रांस्तस्मिन् युगपदाक्षिपन् । अप्राप्तांश्चैव तानाशु भीष्मः सर्वांस्तथान्तरा ॥ २६ ॥ अच्छिन्दच्छरवर्षेण महता लोमवाहिना । ततस्ते पार्थिवाः सर्वे सर्वतः परिवार्य तम् ॥ २७ ॥ ववृषुः शरवर्षेण वर्षेणेवाद्रिमम्बुदाः । स तं बाणमयं वर्षं शरैरावार्य सर्वतः ॥ २८ ॥ ततः सर्वान् महीपालान् पर्यविध्यत् त्रिभिस्त्रिभिः । एकैकस्तु ततो भीष्मं राजन् विव्याध पञ्चभिः ॥ २९ ॥ राजन्! उन नरेशोंने भीष्मजीपर एक ही साथ दस हजार बाण चलाये; परंतु भीष्मजीने उन सबको अपने ऊपर आनेसे पहले बीचमें ही विशाल पंखयुक्त बाणोंकी बौछार करके शीघ्रतापूर्वक काट गिराया। तब वे सब राजा उन्हें चारों ओरसे घेरकर उनके ऊपर उसी प्रकार बाणोंकी झड़ी लगाने लगे, जैसे बादल पर्वतपर पानीकी धारा बरसाते हैं। भीष्मजीने सब ओरसे उस बाण-वर्षाको रोककर उन सभी राजाओंको तीन-तीन बाणोंसे घायल कर दिया। तब उनमेंसे प्रत्येकने भीष्मजीको पाँच-पाँच बाण मारे ॥ २६—२९ ॥ स च तान् प्रतिविव्याध द्वाभ्यां द्वाभ्यां पराक्रमन् । तद् युद्धमासीत् तुमुलं घोरं देवासुरोपमम् ॥ ३० ॥ पश्यतां लोकवीराणां शरशक्तिसमाकुलम् । स धनूंषि ध्वजाग्राणि वर्माणि च शिरांसि च ॥ ३१ ॥ चिच्छेद समरे भीष्मः शतशोऽथ सहस्रशः । तस्याति पुरुषानन्याँल्लाघवं रथचारिणः ॥ ३२ ॥ रक्षणं चात्मनः संख्ये शत्रवोऽप्यभ्यपूजयन् । तान् विनिर्जित्य तु रणे सर्वशस्त्रभृतां वरः ॥ ३३ ॥ कन्याभिः सहितः प्रायाद् भारत्तो भारतान प्रति । ततस्तं पृष्ठतो राजञ्छाल्वराजो महारथः ॥ ३४ ॥