महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextवज्रैरिव महावेगैराजघ्नतुरमर्षणौ ॥ ६४ ॥ भारत! जब उस प्रदेशके सारे वृक्ष गिरा दिये गये, तब एक-दूसरेका वध करनेकी इच्छासे उन महाबली वीरोंने वहाँ ढेर-की-ढेर पड़ी हुई सैकड़ों शिलाएँ लेकर दो घड़ीतक इस प्रकार युद्ध किया, मानो दो पर्वतराज बड़े-बड़े मेघखण्डोंद्वारा परस्पर युद्ध कर रहे हों। वहाँकी शिलाएँ विशाल और अत्यन्त भयंकर थीं। वे देखनेमें महान् वेगशाली वज्रोंके समान जान पड़ती थीं। अमर्षमें भरे हुए वे दोनों योद्धा उन्हीं शिलाओंद्वारा एक-दूसरेको मारने लगे ॥ ६२—६४ ॥
अभिद्रुत्य च भूयस्तावन्योन्यं बलदर्पितौ । भुजाभ्यां परिगृह्याथ चकषाते गजाविव ॥ ६५ ॥ तत्पश्चात् अपने-अपने बलके घमण्डमें भरे हुए वे दोनों वीर एक दूसरेकी ओर झपटकर पुनः अपनी भुजाओंसे कसते हुए विपक्षीको उसी प्रकार खींचने लगे, जैसे दो गजराज परस्पर भिड़कर एक-दूसरेको खींच रहे हों ॥ ६५ ॥
मुष्टिभिश्च महाघोरैरन्योन्यमभिजघ्नतुः । ततः कटकटाशब्दो बभूव सुमहात्मनोः ॥ ६६ ॥ अपने अत्यन्त भयानक मुक्कोंद्वारा वे परस्पर चोट करने लगे। तब उन दोनों महाकाय वीरोंमें जोर-जोरसे कटकटानेकी आवाज होने लगी ॥ ६६ ॥
ततः संहृत्य मुष्टिं तु पञ्चशीर्षमिवोरगम् । वेगेनाभ्यहनद् भीमो राक्षसस्य शिरोधराम् ॥ ६७ ॥ तदनन्तर भीमसेनने पाँच सिरवाले सर्पकी भाँति अपने पाँच अंगुलियोंसे युक्त हाथकी मुट्ठी बाँधकर उसे राक्षसकी गर्दनपर बड़े वेगसे दे मारा ॥ ६७ ॥
ततः श्रान्तं तु तद् रक्षो भीमसेनभुजाहतम् । सुपरिश्रान्तमालक्ष्य भीमसेनोऽभ्यवर्तत ॥ ६८ ॥ भीमसेनकी भुजाओंके आघातसे वह राक्षस थक गया था। तदनन्तर उसे अधिक थका हुआ देख भीमसेन आगे बढ़ते गये ॥ ६८ ॥
तत एनं महाबाहुर्बाहुभ्याममरोपमः । समुत्क्षिप्य बलाद् भीमो विनिष्पिष्य महीतले ॥ ६९ ॥ तत्पश्चात् देवताओंके समान तेजस्वी महाबाहु भीमसेनने उस राक्षसको दोनों भुजाओंसे बलपूर्वक उठा लिया और उसे पृथ्वीपर पटककर पीस डाला ॥ ६९ ॥
तस्य गात्राणि सर्वाणि चूर्णयामास पाण्डवः । अरत्निना चाभिहत्य शिरः कायादपाहरत् ॥ ७० ॥ उस समय पाण्डुनन्दन भीमने उसके सारे अंगोंको दबाकर चूर-चूर कर दिया और थप्पड़ मारकर उसके सिरको धड़से अलग कर दिया ॥ ७० ॥
संदष्टौष्ठं विवृत्ताक्षं फलं वृक्षादिव च्युतम् ।