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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,580 pages

Page 1112 of 2580

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Page 1112

सप्त देवर्षयस्तात वसिष्ठप्रमुखाः सदा ॥ १५ ॥
‘तात! वसिष्ठ आदि सात देवर्षि इन्हीं प्रजापतिमें लीन होते और पुनः इन्हींसे प्रकट होते हैं॥ १५॥
देशं विरजसं पश्य मेरोः शिखरमुत्तमम् ।
यत्रात्मतृप्तैरध्यास्ते देवैः सह पितामहः ॥ १६ ॥
‘युधिष्ठिर! मेरुका वह उत्तम शिखर देखो, जो रजोगुण रहित प्रदेश है, वहाँ अपने-आपमें तृप्त रहनेवाले देवताओंके साथ पितामह ब्रह्मा निवास करते हैं॥ १६॥
यमाहुः सर्वभूतानां प्रकृतेः प्रकृतिं ध्रुवम् ।
अनादिनिधनं देवं प्रभुं नारायणं परम् ॥ १७ ॥
ब्रह्मणः सदनात् तस्य परं स्थानं प्रकाशते ।
देवा अपि न पश्यन्ति सर्वतेजोमयं शुभम् ॥ १८ ॥
अत्यर्कानलदीप्तं तत् स्थानं विष्णोर्महात्मनः ।
स्वयैव प्रभया राजन् दुष्प्रेक्ष्यं देवदानवैः ॥ १९ ॥
‘जो समस्त प्राणियोंकी पञ्चभूतमयी प्रकृतिके अक्षय उपादान हैं, जिन्हें ज्ञानी पुरुष अनादि अनन्त दिव्य-स्वरूप परम प्रभु नारायण कहते हैं, उनका उत्तम स्थान उस ब्रह्मलोकसे भी ऊपर प्रकाशित हो रहा है। देवता भी उन सर्वतेजोमय शुभस्वरूप भगवान्‌का सहज ही दर्शन नहीं कर पाते। राजन्! परमात्मा विष्णुका वह स्थान सूर्य और अग्निसे भी अधिक तेजस्वी है और अपनी ही प्रभासे प्रकाशित होता है। देवताओं और दानवोंके लिये उसका दर्शन अत्यन्त कठिन है॥ १७—१९॥
प्राच्यां नारायणस्थानं मेरावतिविराजते ।
यत्र भूतेश्वरस्तात सर्वप्रकृतिरात्मभूः ॥ २० ॥
भासयन् सर्वभूतानि सुश्रियाभिविराजते ।
नात्र ब्रह्मर्षयस्तात कुत एव महर्षयः ॥ २१ ॥
प्राप्नुवन्ति गतिं ह्येतां यतीनां भावितात्मनाम् ।
न तं ज्योतींषि सर्वाणि प्राप्य भासन्ति पाण्डव ॥ २२ ॥
‘तात! पूर्व दिशामें मेरुपर ही भगवान् नारायणका स्थान सुशोभित हो रहा है, जहाँ सम्पूर्ण भूतोंके स्वामी तथा सबके उपादान कारण स्वयंभू भगवान् विष्णु अपने उत्कृष्ट तेजसे सम्पूर्ण भूतोंको प्रकाशित करते हुए विराजमान होते हैं। वहाँ यत्नशील ज्ञानी महात्माओंकी ही पहुँच हो सकती है। उस नारायणधाममें ब्रह्मर्षियोंकी भी गति नहीं है। फिर महर्षि तो वहाँ जा ही कैसे सकते हैं। पाण्डुनन्दन! सम्पूर्ण ज्योतिर्मय पदार्थ भगवान्‌के निकट जाकर अपना तेज खो बैठते हैं—उनमें पूर्ववत् प्रकाश नहीं रह जाता॥ २०—२२॥
स्वयं प्रभुरचिन्त्यात्मा तत्र ह्यातिविराजते ।