महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextलोकेऽमुष्मिन् पार्थिव यानि सन्ति । अस्मिंस्तु लोके मम यानमेत- दस्मद्विधानामपरेषां च राजन् ॥ ५० ॥ वामदेवने कहा— राजन्! इसमें संदेह नहीं कि हम-जैसे लोगोंके लिये वेदके मन्त्र ही वाहनका काम देते हैं। परंतु वे परलोकमें ही उपलब्ध होते हैं। इस लोकमें तो हम-जैसे लोगोंके तथा दूसरोंके लिये भी ये अश्व ही वाहन होते हैं ॥ ५० ॥
राजोवाच
चत्वारस्त्वां वा गर्दभाः संवहन्तु श्रेष्ठाश्वतर्यो हरयो वातरंहाः । तैस्त्वं याहि क्षत्रियस्यैष वाहो ममैव वाम्यौ न तवैतौ हि विद्धि ॥ ५१ ॥ राजाने कहा— ब्रह्मन्! तब चार गधे, अच्छी जातिकी खच्चरियाँ या वायुके समान वेगशाली दूसरे घोड़े आपकी सवारीके लिये प्रस्तुत हो सकते हैं। इन्हीं वाहनोंद्वारा आप यात्रा करें। यह वाहन, जिसे आप माँगने आये हैं, क्षत्रिय नरेशके ही योग्य हैं। इसलिये आप यह समझ लें कि ये वाम्य अश्व मेरे ही हैं, आपके नहीं ॥ ५१ ॥
वामदेव उवाच
घोरं व्रतं ब्राह्मणस्यैतदाहु- रेतद् राजन् यदिहाजीवमानः । अयस्मया घोररूपा महान्त- श्चत्वारो वा यातुधानाः सुरौद्राः । मया प्रयुक्तास्त्वद्वधमीप्समाना वहन्तु त्वां शितशूलाश्चतुर्धा ॥ ५२ ॥ वामदेव बोले— राजन्! तुम ब्राह्मणोंके इस धनको हड़पकर जो अपने उपयोगमें लाना चाहते हो, यह बड़ा भयंकर कर्म कहा गया है। यदि मेरे घोड़े वापस न दोगे तो मेरी आज्ञा पाकर विकराल रूपधारी तथा लौह-शरीरवाले अत्यन्त भयंकर चार बड़े-बड़े राक्षस हाथोंमें तीखे त्रिशूल लिये तुम्हारे वधकी इच्छासे टूट पड़ेंगे और तुम्हारे शरीरके चार टुकड़े करके उठा ले जायँगे ॥ ५२ ॥
राजोवाच
ये त्वां विदुर्ब्राह्मणं वामदेव वाचा हन्तुं मनसा कर्मणा वा । ते त्वां सशिष्यमिह पातयन्तु