महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextसप्तषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
जयद्रथ और द्रौपदीका संवाद
वैशम्पायन उवाच
तथाऽऽसीनेषु सर्वेषु तेषु राजसु भारत ।
यदुक्तं कृष्णया सार्धं तत् सर्वं प्रत्यवेदयत् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—भारत! पूर्वोक्त प्रकारसे रथपर बैठे हुए उन सब राजाओंके
पास जाकर कोटिकास्यने द्रौपदीके साथ उसकी जो-जो बातें हुई थीं, वे सब कह
सुनायीं ॥ १ ॥
कोटिकास्यवचः श्रुत्वा शैब्यं सौवीरकोऽब्रवीत् ।
यदा वाचं व्याहरन्त्यामस्यां मे रमते मनः ॥ २ ॥
सीमन्तिनीनां मुख्यायां विनिवृत्तः कथं भवान् ।
एतां दृष्ट्वा स्त्रियो मेऽन्या यथा शाखामृगस्त्रियः ॥ ३ ॥
प्रतिभान्ति महाबाहो सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ।
दर्शनादेव हि मनस्तया मेऽपहृतं भृशम् ॥ ४ ॥
तां समाचक्ष्व कल्याणीं यदि स्याच्छैब्य मानुषी ।
कोटिकास्यकी बात सुनकर सौवीरनरेश जयद्रथने उससे कहा—'शैब्य! सुन्दरियोंमें
सर्वश्रेष्ठ वह युवती जब तुमसे बातचीत कर रही थी, उस समय मेरा मन उसीमें लगा हुआ
था। तुम उसे साथ लिये बिना कैसे लौट आये? महाबाहो! मैं तुमसे यह सच कहता हूँ इसे
देखकर मुझे दूसरी स्त्रियाँ ऐसी जान पड़ती हैं मानो बंदरियाँ हों। उसने दर्शनमात्रसे ही मेरे
मनको अच्छी तरह हर लिया है। शैब्य! यदि वह मानवी हो तो उस कल्याणीके विषयमें
ठीक-ठीक बताओ' ॥ २—४ १/२ ॥
कोटिक उवाच
एषा वै द्रौपदी कृष्णा राजपुत्री यशस्विनी ॥ ५ ॥
पञ्चानां पाण्डुपुत्राणां महिषी सम्मता भृशम् ।
सर्वेषां चैव पार्थानां प्रिया बहुमता सती ॥ ६ ॥
तया समेत्य सौवीर सौवीराभिमुखो व्रज ।
कोटिक बोला—सौवीरनरेश! यह यशस्विनी राजकुमारी द्रुपदपुत्री कृष्णा ही है, जो
पाँचों पाण्डवोंकी अत्यन्त आदरणीया महारानी है। कुन्तीके सभी पुत्र इसे प्यार करते हैं।
यह सती-साध्वी देवी अपने पतियोंके लिये बड़े सम्मानकी वस्तु है। तुम उससे मिलकर
सौवीरदेशकी राह लो ॥ ५-६ १/२ ॥