महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
Page 2253 of 2580
Read in contextमत्स्यदेशके राजा विराटके सामने उस जुआरीके देखते-देखते कीचकने जो लात मारकर मेरा अपमान किया है, उसको सहकर मेरी-जैसी कौन राजकुमारी जीवित रह सकती है? ।। ५ ।।
एवं बहुविधैः क्लेशैः क्लिश्यमानां च भारत ।
न मां जानासि कौन्तेय किं फलं जीवितेन मे ।। ६ ।।
भरतकुलभूषण कुन्तीनन्दन! ऐसे बहुत-से क्लेशोंद्वारा मैं निरन्तर पीड़ित रहती हूँ; क्या तुम यह नहीं जानते? फिर मेरे जीनेका ही क्या प्रयोजन है? ।। ६ ।।
योऽयं राज्ञो विराटस्य कीचको नाम भारत ।
सेनानीः पुरुषव्याघ्र श्यालः परमदुर्मतिः ।। ७ ।।
स मां सैरन्ध्रिवेषेण वसन्तीं राजवेश्मनि ।
नित्यमेवाह दुष्टात्मा भार्या मम भवेति वै ।। ८ ।।
भारत! पुरुषसिंह! राजा विराट्का जो यह कीचक नामक सेनापति है, वह उनका साला लगता है। उसकी बुद्धि बड़ी खोटी है। राजमहलमें सैरन्ध्रीके वेशमें निवास करती हुई मुझे देखकर वह दुष्टात्मा प्रतिदिन ही आकर मुझसे कहता है—‘मेरी ही पत्नी हो जाओ’ ।।
तेनोपमन्त्र्यमाणाया वधार्हेण सपत्नहन् ।
कालेनेव फलं पक्वं हृदयं मे विदीर्यते ।। ९ ।।
शत्रुदमन! उस मार डालने योग्य पापीके द्वारा रोज-रोज यह घृणित प्रस्ताव सुनते-सुनते समयसे पके हुए फलकी भाँति मेरा हृदय विदीर्ण हो रहा है ।। ९ ।।
(विजानामि तवामर्षं बलं वीर्यं च पाण्डव ।
ततोऽहं परिदेवामि चाग्रतस्ते महाबल ।।
महाबली पाण्डुनन्दन! मैं तुम्हारे अमर्ष, बल और पराक्रमको जानती हूँ; इसीलिये मैं तुम्हारे आगे रोती-बिलखती हूँ।
यथा यूथपतिर्मत्तः कुञ्जरः षष्टिहायनः ।
भूमौ निपतितं बिल्वं पद्ध्यामाक्रम्य पीडयेत् ।।
तथैव च शिरस्तस्य निपात्य धरणीतले ।
वामेन पुरुषव्याघ्र मर्द पादेन पाण्डव ।।
पुरुषसिंह पाण्डुपुत्र! जैसे साठ वर्षका मतवाला यूथपति गजराज धरतीपर गिरे हुए बेलके फलको पैरोंसे दबाकर कुचल डाले, उसी प्रकार कीचकके मस्तकको पृथ्वीपर गिराकर बाँयें पैरसे मसल डालो।
स चेदुद्यन्तमादित्यं प्रातरुत्थाय पश्यति ।
कीचकः शर्वरीं व्युष्टां नाहं जीवितुमुत्सहे ।।)
यदि कीचक इस रात्रिके बीतनेपर प्रातःकाल उठकर उगते हुए सूर्यका दर्शन कर लेगा, तो मैं जीवित नहीं रह सकूँगी।