महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextलाख दासियाँ सोनेके पात्र हाथमें लिये दिन-रात अतिथियोंको भोजन कराया करती थीं तथा जो दाताओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर रोज सहस्रों स्वर्णमुद्राएँ दानमें बाँटा करते थे, वे ही धर्मराज यहाँ जूएमं कमाये हुए महान् अनर्थकारी धनसे जीवन-निर्वाह कर रहे हैं ॥ १६—१८ ॥
एनं हि स्वरसम्पन्ना बहवः सूतमागधाः ।
सायम्प्रातरुपातिष्ठन् सुमृष्टमणिकुण्डलाः ॥ १९ ॥
इन्द्रप्रस्थमें विशुद्ध मणिमय कुण्डल धारण करनेवाले बहुत-से सूत और मागध मधुर स्वरसे संयुक्त वाणीद्वारा सायंकाल और प्रातःकाल इन महाराजकी स्तुति किया करते थे ॥ १९ ॥
सहस्रमृषयो यस्य नित्यमासन् सभासदः ।
तपःश्रुतोपसम्पन्नाः सर्वकामैरुपस्थिताः ॥ २० ॥
तपस्या और वेदज्ञानसे सम्पन्न सहस्रों पूर्णकाम ऋषि-महर्षि प्रतिदिन इनकी राजसभामें बैठा करते थे ॥
अष्टाशीतिसहस्राणि स्नातका गृहमेधिनः ।
त्रिंशद्दासीक एकैको यान् बिभर्ति युधिष्ठिरः ॥ २१ ॥
अट्ठासी हजार स्नातक गृहस्थ ब्राह्मणोंका, जिनमेंसे एक-एककी सेवाके लिये तीस-तीस दासियाँ थीं, राजा युधिष्ठिर अपने यहाँ पालन करते थे ॥ २१ ॥
अप्रतिग्राहिणां चैव यतीनामूर्ध्वरेतसाम् ।
दश चापि सहस्राणि सोऽयमास्ते नरेश्वरः ॥ २२ ॥
साथ ही ये महाराज दान न लेनेवाले दस हजार ऊर्ध्वरेता संन्यासियोंका भी स्वयं ही भरण-पोषण करते थे। आज वे ही इस अवस्थामें रह रहे हैं ॥ २२ ॥
आनृशंस्यमनुक्रोशं संविभागस्तथैव च ।
यस्मिन्नेतानि सर्वाणि सोऽयमास्ते नरेश्वरः ॥ २३ ॥
जिनमें कोमलता, दया और सबको अन्न-वस्त्र देना आदि समस्त सद्गुण विद्यमान थे, वे ही ये महाराज आज इस दुरवस्थामें पड़े हैं ॥ २३ ॥
अन्धान् वृद्धांस्तथानाथान् बालान् राष्ट्रेषु दुर्गतान् ।
बिभर्ति विविधान् राजा धृतिमान् सत्यविक्रमः ।
संविभागमना नित्यमानृशंस्याद् युधिष्ठिरः ॥ २४ ॥
धैर्यवान् तथा सत्यपराक्रमी राजा युधिष्ठिर अपने कोमल स्वभावके कारण सदा सबको भोजन आदि देनेमें ही मन लगाते थे और अपने राज्यके अनेक अंधों, बूढ़ों, अनाथों, बालकों तथा दुर्गतिमें पड़े हुए लोगोंका भरण-पोषण करते रहते थे ॥ २४ ॥
स एष निरयं प्राप्तो मत्स्यस्य परिचारकः ।
सभायां देविता राज्ञः कङ्को ब्रूते युधिष्ठिरः ॥ २५ ॥