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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,580 pages

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स्प्रष्टुं राजसहस्राणि तेजसाप्रतिमानि वै ।

समरे नाभ्यवर्तन्त वेलामिव महार्णवः ॥ २२ ॥

सोऽयं राज्ञो विराटस्य कन्यानां नर्तको युवा ।

आस्ते वेषप्रतिच्छन्नः कन्यानां परिचारकः ॥ २३ ॥

जैसे महासागर तट सीमाको नहीं लाँघ पाता, उसी प्रकार सहस्रों अप्रतिम तेजवाले

राजा जिस वीरको वशीभूत करनेके लिये आगे न बढ़ सके, वही तरुण अर्जुन इस समय

राजा विराटकी कन्याओंको नाचना सिखा रहा है और हीजड़ेके वेषमें छिपकर उन

कन्याओंकी सेवा करता है ॥ २२-२३ ॥

यस्य स्म रथघोषेण समकम्पत मेदिनी ।

सपर्वतवना भीम सहस्थावरजङ्गमा ॥ २४ ॥

यस्मिन् जाते महाभागे कुन्त्याः शोको व्यनश्यत ।

स शोचयति मामद्य भीमसेन तवानुजः ॥ २५ ॥

भीमसेन! जिसके रथकी घर्घरहाटसे पर्वत, वन और चराचर प्राणियोंसहित सम्पूर्ण

पृथ्वी काँप उठती थी, जिस महान् भाग्यशाली पुत्रके उत्पन्न होनेपर माता कुन्तीका सारा

शोक नष्ट हो गया था, वही तुम्हारा छोटा भाई अर्जुन आज अपनी दुरवस्थाके कारण मुझे

शोकमग्न किये देता है ॥ २४-२५ ॥

भूषितं तमलंकारैः कुण्डलैः परिहाटकैः ।

कम्बुपाणिनमायान्तं दृष्ट्वा सीदति मे मनः ॥ २६ ॥

अर्जुनको स्त्रीजनोचित आभूषणों तथा सुवर्णमय कुण्डलोंसे विभूषित हो हाथोंमें

शंखकी चूड़ियाँ धारण किये आते देख मेरा हृदय दुःखित हो जाता है ॥ २६ ॥

यस्य नास्ति समो वीर्ये कश्चिदुर्व्यां धनुर्धरः ।

सोऽद्य कन्यापरिवृतो गायन्नास्ते धनंजयः ॥ २७ ॥

इस भूतलपर जिसके बल-पराक्रमकी समानता करनेवाला कोई धनुर्धर वीर नहीं है,

वही धनंजय आज राजकन्याओंके बीचमें बैठकर गीत गाया करता है ॥ २७ ॥

धर्मे शौर्ये च सत्ये च जीवलोकस्य सम्मतम् ।

स्त्रीवेषविकृतं पार्थं दृष्ट्वा सीदति मे मनः ॥ २८ ॥

धर्म, शूरवीरता और सत्यभाषणमें जो सम्पूर्ण जीव-जगत्के लिये एक आदर्श था, उसी

अर्जुनको अब स्त्रीवेषमें विकृत हुआ देखकर मेरा हृदय शोकमें डूब जाता है ॥ २८ ॥

यदा ह्येनं परिवृतं कन्याभिर्देवरूपिणम् ।

प्रभिन्नमिव मातङ्गं परिकीर्णं करेणुभिः ॥ २९ ॥

मत्स्यमर्थपतिं पार्थं विराटं समुपस्थितम् ।

पश्यामि तूर्यमध्यस्थं दिशो नश्यन्ति मे तदा ॥ ३० ॥