महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextवहाँ सुन्दर लटोंवाली कृष्णाने कहा—'शत्रुतापन! जैसा तुमने कहा था, उसके अनुसार मैंने कीचकको नृत्यशालामें मिलनेका संकेत कर दिया है ॥ २५ ॥ शून्यं स नर्तनागारमागमिष्यति कीचकः । एको निशि महाबाहो कीचकं तं निष्पूदय ॥ २६ ॥ 'अतः महाबाहो! कीचक रातके समय उस सूनी नृत्यशालामें अकेला आवेगा। तुम वहीं उसे मार डालना ॥ तं सूतपुत्रं कौन्तेय कीचकं मददर्पितम् । गत्वा त्वं नर्तनागारं निर्जीवं कुरु पाण्डव ॥ २७ ॥ 'कुन्तीकुमार! पाण्डुनन्दन! तुम नृत्यगृहमें जाकर उस मदोन्मत्त सूतपुत्र कीचकको प्राणशून्य कर दो ॥ २७ ॥ दर्पाच्च सूतपुत्रोऽसौ गन्धर्वानवमन्यते । तं त्वं प्रहरतां श्रेष्ठ ह्रदान्नागमिवोद्धर ॥ २८ ॥ 'प्रहार करनेवालोंमें श्रेष्ठ वीर! वह सूतपुत्र अपनी वीरताके घमंडमें आकर गन्धर्वोंकी अवहेलना करता है; अतः जलाशयसे सर्पकी भाँति उसे तुम इस जगत्से निकाल फेंको ॥ २८ ॥ अश्रु दुःखाभिभूताया मम मार्जस्व भारत । आत्मनश्चैव भद्रं ते कुरु मानं कुलस्य च ॥ २९ ॥ 'भारत! तुम्हारा कल्याण हो। तुम कीचकको मारकर मुझ दुःखपीड़ित अबलाके आँसू पोंछो तथा अपना और अपने कुलका सम्मान बढ़ाओ' ॥ २९ ॥
भीमसेन उवाच
स्वागतं ते वरारोहे यन्मां वेदयसे प्रियम् । न ह्यन्यं कञ्चिदिच्छामि सहायं वरवर्णिनि ॥ ३० ॥ **भीमसेन बोले—**वरारोहे! तुम्हारा स्वागत है; क्योंकि तुमने मुझे प्रिय संवाद सुनाया है। सुन्दरी! मैं इस कार्यमें दूसरे किसीको सहायक बनाना नहीं चाहता ॥ या मे प्रीतिस्त्वयाऽऽख्याता कीचकस्य समागमे । हत्वा हिडिम्बं सा प्रीतिर्ममासीद् वरवर्णिनि ॥ ३१ ॥ वरवर्णिनि! कीचकसे मिलनेके लिये तुमने जो शुभ संवाद दिया है और इसे सुनकर मुझे जितनी प्रसन्नता हुई है, ऐसी प्रसन्नता मुझे हिडिम्बासुरको मारकर प्राप्त हुई थी ॥ ३१ ॥ सत्यं भ्रातृंश्च धर्मं च पुरस्कृत्य ब्रवीमि ते । कीचकं निहनिष्यामि वृत्रं देवपतिर्यथा ॥ ३२ ॥