महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in context**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! कीचकसे ऐसा कहकर भयंकरपराक्रमी कुन्तीपुत्र महाबाहु भीमसेन सहसा उछलकर खड़े हो गये और हँसते हुए इस प्रकार बोले—॥ ४९ ॥ अद्य त्वां भगिनी पापं कृष्यमाणं मया भुवि । द्रक्ष्यतेऽद्रिप्रतीकाशं सिंहेनेव महाग़जम् ॥ ५० ॥ 'अरे! तू पर्वतके समान विशालकाय है, तो भी जैसे सिंह महान् गजराजको घसीटता है, उसी प्रकार आज मैं तुझ पापीको पृथ्वीपर पटककर घसीटूंगा और तेरी बहिन यह सब देखेगी ॥ ५० ॥ निराबाधा त्वयि हते सैरन्ध्री विचरिष्यति । सुखमेव चरिष्यन्ति सैरन्ध्र्याः पतयः सदा ॥ ५१ ॥ 'इस प्रकार तेरे मारे जानेपर सैरन्ध्री बेखटके विचरेगी और उसके पति भी सदा सुखसे ही रहेंगे' ॥ ५१ ॥ ततो जग्राह केशेषु माल्यवत्सु महाबलः । स केशेषु परामृष्टो बलेन बलिनां वरः ॥ ५२ ॥ आक्षिप्य केशान् वेगेन बाह्वोर्जग्राह पाण्डवम् । बाहुयुद्धं तयोरासीत् क्रुद्धयोर्नरसिंहयोः ॥ ५३ ॥ वसन्ते वासिताहेतोर्बलवद्द्वजयोरिव । ऐसा कहकर महाबली भीमसेनने उसके पुष्पहार-विभूषित केश पकड़ लिये। कीचक भी बलवानोंमें श्रेष्ठ था। सिरके बाल पकड़ लिये जानेपर उसने बलपूर्वक झटका देकर उन्हें छुड़ा लिया और बड़ी फुर्तीसे पाण्डुनन्दन भीमको दोनों भुजाओंमें भर लिया। तदनन्तर क्रोधमें भरे हुए उन दोनों पुरुषसिंहोंमें बाहुयुद्ध होने लगा, मानो वसन्त-ऋतुमें हथिनीके लिये दो बलवान् गजराज एक-दूसरेसे जूझ रहे हों ॥ ५२-५३ १/२ ॥ कीचकानां तु मुख्यस्य नराणामुत्तमस्य च ॥ ५४ ॥ वालिसुग्रीवयोर्भ्रात्रोः पुरेव कपिसिंहयोः । अन्योन्यमपि संरब्धौ परस्परजयैषिणौ ॥ ५५ ॥ एक ओर कीचकोंका प्रधान कीचक था, तो दूसरी ओर मनुष्योंमें श्रेष्ठ भीमसेन। जैसे पूर्वकालमें कपिश्रेष्ठ वाली और सुग्रीव दोनों भाइयोंमें घोर युद्ध हुआ था, वैसा ही इन दोनोंमें भी होने लगा। दोनों एक-दूसरेपर कुपित थे और परस्पर विजय पानेकी इच्छासे लड़ रहे थे ॥ ५४-५५ ॥ ततः समुद्यम्य भुजौ पञ्चशीर्षाविवोरगौ । नखदंष्ट्राभिरन्योन्यं घ्नतः क्रोधविषोद्धतौ ॥ ५६ ॥ फिर दोनों क्रोधरूपी विषसे उद्धत हुए पाँच मस्तकोंवाले सर्पोंकी भाँति अपनी-अपनी (पाँच अंगुलियोंसे युक्त) भुजाओंको ऊपर उठाकर एक-दूसरेपर नखों और दाँतोंसे प्रहार