महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextउस स्थानमें अत्यन्त भयंकर तथा प्रज्वलित मुखवाले विशालकाय सर्प मौजूद थे। श्वेत बादलोंके समूहकी भाँति ढेर-के-ढेर युद्धमें फेंकनेयोग्य पत्थर भी रखे हुए थे ॥ ६ ॥ दशवाजिसहस्राणि हरीणां वातरंहसाम् । वहन्ति यं नेत्रमुषं दिव्यं मायामयं रथम् ॥ ७ ॥ वायुके समान वेगशाली दस हजार श्वेत-पीत रंगवाले घोड़े नेत्रोंमें चकाचौंध पैदा करनेवाले उस दिव्य मायामय रथको वहन करते थे ॥ ७ ॥ तत्रापश्यन्महानीलं वैजयन्तं महाप्रभम् । ध्वजमिन्दीवरश्यामं वंशं कनकभूषणम् ॥ ८ ॥ अर्जुनने उस रथपर अत्यन्त नीलवर्णवाले महातेजस्वी 'वैजयन्त' नामक इन्द्रध्वजको फहराता देखा। उसकी श्याम सुषमा नील कमलकी शोभाको तिरस्कृत कर रही थी। उस ध्वजके दण्डमें सुवर्ण मढ़ा हुआ था ॥ ८ ॥ तस्मिन् रथे स्थितं सूतं तप्तहेमविभूषितम् । दृष्ट्वा पार्थो महाबाहुर्देवमेवान्वतर्कयत् ॥ ९ ॥ महाबाहु कुन्तीकुमारने उस रथपर बैठे हुए सारथिकी ओर देखा, जो तपाये हुए सुवर्णके आभूषणोंसे विभूषित था। उसे देखकर उन्होंने कोई देवता ही समझा ॥ ९ ॥ तथा तर्कयतस्तस्य फाल्गुनस्याथ मातलिः । संनतः प्रस्थितो भूत्वा वाक्यमर्जुनमब्रवीत् ॥ १० ॥ इस प्रकार विचार करते हुए अर्जुनके सम्मुख उपस्थित हो मातलिने विनीतभावसे कहा ॥ १० ॥
मातलिरुवाच
भो भोः शक्रात्मज श्रीमाञ्छक्रस्त्वां द्रष्टुमिच्छति । आरोहतु भवाञ्छीघ्रं रथमिन्द्रस्य सम्मतम् ॥ ११ ॥ मातलि बोला— इन्द्रकुमार! श्रीमान् देवराज इन्द्र आपको देखना चाहते हैं। यह उनका प्रिय रथ है। आप इसपर शीघ्र आरूढ़ होइये ॥ ११ ॥ आह माममरश्रेष्ठः पिता तव शतक्रतुः । कुन्तीसुतमिह प्राप्तं पश्यन्तु त्रिदशालयाः ॥ १२ ॥ एष शक्रः परिवृतो देवैर्ऋषिगणैस्तथा । गन्धर्वैरप्सरोभिश्च त्वां दिदृक्षुः प्रतीक्षते ॥ १३ ॥ आपके पिता देवेश्वर शतक्रतुने मुझसे कहा है कि 'तुम कुन्तीनन्दन अर्जुनको यहाँ ले आओ, जिससे सब देवता उन्हें देखें।' देवताओं, महर्षियों, गन्धर्वों तथा अप्सराओंसे घिरे हुए इन्द्र आपको देखनेके लिये प्रतीक्षा कर रहे हैं ॥ १२-१३ ॥ अस्माल्लोकाद् देवलोकं पाकशासनशासनात् ।