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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,580 pages

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उर्वश्युवाच

तव पित्राभ्यनुज्ञातां स्वयं च गृहमागताम् । यस्मान्मां नाभिनन्देथाः कामबाणवशंगताम् ॥ ४९ ॥ तस्मात् त्वं नर्तनः पार्थ स्त्रीमध्ये मानवर्जितः । अपुमानिति विख्यातः षण्ढवद् विचरिष्यसि ॥ ५० ॥ उर्वशी बोली— अर्जुन! तुम्हारे पिता इन्द्रके कहनेसे मैं स्वयं तुम्हारे घरपर आयी और कामबाणसे घायल हो रही हूँ, फिर भी तुम मेरा आदर नहीं करते। अतः तुम्हें स्त्रियोंके बीचमें सम्मानरहित होकर नर्तक बनकर रहना पड़ेगा। तुम नपुंसक कहलाओगे और तुम्हारा सारा आचार-व्यवहार हिजड़ोंके ही समान होगा ॥ ४९-५० ॥

एवं दत्त्वार्जुने शापं स्फुरदोष्ठी श्वसन्त्यथ । पुनः प्रत्यागता क्षिप्रमुर्वशी गृहमात्मनः ॥ ५१ ॥ फड़कते हुए ओठोंसे इस प्रकार शाप देकर उर्वशी लंबी साँसें खींचती हुई पुनः शीघ्र ही अपने घरको लौट गयी ॥ ५१ ॥

ततोऽर्जुनस्त्वरमाणश्चित्रसेनमरिंदमः । सम्प्राप्य रजनीवृत्तं तदुर्वश्या यथातथम् ॥ ५२ ॥ निवेदयामास तदा चित्रसेनाय पाण्डवः । तत्र चैवं यथावृत्तं शापं चैव पुनः पुनः ॥ ५३ ॥