महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextस तया बाह्यतः सार्धं त्रिरात्रं नैषधोऽवसत् ।। ७ ।। दमयन्तीके शरीरपर भी एक ही वस्त्र था। वह जाते हुए राजा नलके पीछे हो ली। वे उसके साथ नगरसे बाहर तीन राततक टिके रहे ।। ७ ।। पुष्करस्तु महाराज घोषयामास वै पुरे । नले यः सम्यगातिष्ठेत् स गच्छेद् वध्यतां मम ।। ८ ।। महाराज! पुष्करने उस नगरमें यह घोषणा करा दी—डुग्गी पिटवा दी कि ‘जो नलके साथ अच्छा बर्ताव करेगा, वह मेरा वध्य होगा’ ।। ८ ।। पुष्करस्य तु वाक्येन तस्य विद्वेषणेन च । पौरा न तस्य सत्कारं कृतवन्तो युधिष्ठिर ।। ९ ।। युधिष्ठिर! पुष्करके उस वचनसे और नलके प्रति पुष्करका द्वेष होनेसे पुरवासियोंने राजा नलका कोई सत्कार नहीं किया ।। ९ ।। स तथा नगराभ्याशे सत्कारार्हो न सत्कृतः । त्रिरात्रमुषितो राजा जलमात्रेण वर्तयन् ।। १० ।। इस प्रकार राजा नल अपने नगरके समीप तीन राततक केवल जलमात्रका आहार करके टिके रहे। वे सर्वथा सत्कारके योग्य थे तो भी उनका सत्कार नहीं किया गया ।। १० ।। पीड्यमानः क्षुधा तत्र फलमूलानि कर्षयन् । प्रातिष्ठत ततो राजा दमयन्ती तमन्वगात् ।। ११ ।। वहाँ भूखसे पीड़ित हो फल-मूल आदि जुटाते हुए राजा नल वहाँसे अन्यत्र चले गये। केवल दमयन्ती उनके पीछे-पीछे गयी ।। ११ ।। क्षुधया पीड्यमानस्तु नलो बहुतिथेऽहनि । अपश्यच्छकुनान् कांश्चिद्धिरण्यसदृशच्छदान् ।। १२ ।। इसी प्रकार नल बहुत दिनोंतक क्षुधासे पीड़ित रहे। एक दिन उन्होंने कुछ ऐसे पक्षी देखे, जिनकी पाँखें सोनेकी-सी थीं ।। १२ ।। स चिन्तयामास तदा निषधाधिपतिर्बली । अस्ति भक्ष्यो ममाद्यायं वसु चेदं भविष्यति ।। १३ ।। उन्हें देखकर (क्षुधातुर और आपत्तिग्रस्त होनेके कारण) बलवान् निषधनरेशके मनमें यह बात आयी कि ‘यह पक्षियोंका समुदाय ही आज मेरा भक्ष्य हो सकता है और इनकी ये पाँखें मेरे लिये धन हो जायँगी’ ।। १३ ।।