महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextदमयन्ती बार-बार उठती और बार-बार विह्वल होकर गिर पड़ती थी। वह कभी भयभीत होकर छिपती और कभी जोर-जोरसे रोने-चिल्लाने लगती थी ।। १४ ।। अतीव शोकसंतप्ता मुहुर्निःश्वस्य विह्वला । उवाच भैमी निःश्वस्य रुदत्यथ पतिव्रता ।। १५ ।। अत्यन्त शोकसंतप्त हो बार-बार लंबी साँसें खींचती हुई व्याकुल पतिव्रता दमयन्ती दीर्घ निःश्वास लेकर रोती हुई बोली- ।। १५ ।। यस्याभिशापाद् दुःखार्तो दुःखं विन्दति नैषधः । तस्य भूतस्य नो दुःखाद् दुःखमप्यधिकं भवेत् ।। १६ ।। ‘जिसके अभिशापसे निषधनरेश नल दुःखसे पीड़ित हो क्लेश-पर-क्लेश उठाते जा रहे हैं, उस प्राणीको हमलोगोंके दुःखसे भी अधिक दुःख प्राप्त हो ।। १६ ।। अपापचेतसं पापो य एवं कृतवान् नलम् । तस्माद् दुःखतरं प्राप्य जीवत्वसुखजीविकाम् ।। १७ ।। ‘जिस पापीने पुण्यात्मा राजा नलको इस दशामें पहुँचाया है, वह उनसे भी भारी दुःखमें पड़कर दुःखी ही जिंदगी बितावे' ।। १७ ।। एवं तु विलपन्ती सा राज्ञो भार्या महात्मनः । अन्वेषमाणा भर्तारं वने श्वापदसेविते ।। १८ ।। उन्मत्तवद् भीमसुता विलपन्ती इतस्ततः । हा हा राजन्निति मुहुरितश्चेतश्च धावति ।। १९ ।। इस प्रकार विलाप करती तथा हिंस्र जन्तुओंसे भरे हुए वनमें अपने पतिको ढूँढ़ती हुई महामना राजा नलकी पत्नी भीमकुमारी दमयन्ती उन्मत्त हुई रोती-बिलखती और ‘हा राजन्! हा महाराज' ऐसा बार-बार कहती हुई इधर-उधर दौड़ने लगी ।। १८-१९ ।। तां क्रन्दमानामत्यर्थं कुररीमिव वाशतीम् । करुणं बहु शोचन्तीं विलपन्तीं मुहुर्मुहुः ।। २० ।। सहसाभ्यागतां भैमीमभ्याशपरिवर्तिनीम् । जग्राहाजगरो ग्राहो महाकायः क्षुधान्वितः ।। २१ ।। वह कुररी पक्षीकी भाँति जोर-जोरसे करुण क्रन्दन कर रही थी और अत्यन्त शोक करती हुई बार-बार विलाप कर रही थी। वहाँसे थोड़ी ही दूरपर एक विशालकाय भूखा अजगर बैठा था। उसने बार-बार चक्कर लगाती सहसा निकट आयी हुई भीमकुमारी दमयन्तीको (पैरोंकी ओरसे) निगलना आरम्भ कर दिया ।। २०-२१ ।। सा ग्रस्यमाना ग्राहेण शोकेन च परिप्लुता । नात्मानं शोचति तथा यथा शोचति नैषधम् ।। २२ ।। शोकमें डूबी हुई वैदर्भीको अजगर निगल रहा था, तो भी वह अपने लिये उतना शोक नहीं कर रही थी, जितना शोक उसे निषधनरेश नलके लिये था ।। २२ ।।