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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,580 pages

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महाभाग! उस तीर्थमें आज भी कमलके चिह्नोंसे चिह्नित सुवर्णमुद्राएँ देखी जाती हैं। शत्रुदमन! यह एक अद्भुत बात है ॥ ६६ ॥ त्रिशूलाङ्कानि पद्मानि दृश्यन्ते कुरुनन्दन । महादेवस्य सांनिध्यं तत्र वै पुरुषर्षभ ॥ ६७ ॥ पुरुषरत्न कुरुनन्दन! जहाँ त्रिशूलसे अंकित कमल दृष्टिगोचर होते हैं। वहीं महादेवजीका निवास है ॥ ६७ ॥ सागरस्य च सिन्धोश्च संगमं प्राप्य भारत । तीर्थे सलिलराजस्य स्नात्वा प्रयतमानसः ॥ ६८ ॥ तर्पयित्वा पितॄन् देवानृषींश्च भरतर्षभ । प्राप्नोति वारुणं लोकं दीप्यमानं स्वतेजसा ॥ ६९ ॥ भारत! सतर और सिंधु नदीके संगममें जाकर वरुणतीर्थमें स्नान करके शुद्धचित्त हो देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंका तर्पण करे। भरतकुलतिलक! ऐसा करनेसे मनुष्य दिव्य दीप्तिसे देदीप्यमान वरुणलोकको प्राप्त होता है ॥ ६८-६९ ॥ शङ्कुकर्णेश्वरं देवमर्चयित्वा युधिष्ठिर । अश्वमेधाद् दशगुणं प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ ७० ॥ युधिष्ठिर! वहाँ शंकुकर्णेश्वर शिवकी पूजा करनेसे मनीषी पुरुष अश्वमेधसे दस गुने पुण्यफलकी प्राप्ति बताते हैं ॥ ७० ॥ प्रदक्षिणमुपावृत्य गच्छेत भरतर्षभ । तीर्थं कुरुवरश्रेष्ठ त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ॥ ७१ ॥ दमीति नाम्ना विख्यातं सर्वपापप्रणाशनम् । तत्र ब्रह्मादयो देवा उपासन्ते महेश्वरम् ॥ ७२ ॥ भरतवंशावतंस कुरुश्रेष्ठ! उनकी परिक्रमा करके त्रिभुवन-विख्यात 'दमी' नामक तीर्थमें जाय, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। वहाँ ब्रह्मा आदि देवता भगवान् महेश्वरकी उपासना करते हैं ॥ ७१-७२ ॥ तत्र स्नात्वा च पीत्वा च रुद्रं देवगणैर्वृतम् । जन्मप्रभृति यत् पापं तत् स्नातस्य प्रणश्यति ॥ ७३ ॥ वहाँ स्नान, जलपान और देवताओंसे घिरे हुए रुद्रदेवका दर्शन-पूजन करनेसे स्नानकर्ता पुरुषके जन्मसे लेकर वर्तमान समयतकके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं ॥ दमी चात्र नरश्रेष्ठ सर्वदेवैरभिष्टुतः । तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र हयमेधमवाप्नुयात् ॥ ७४ ॥ नरश्रेष्ठ! भगवान् दमीका सभी देवता स्तवन करते हैं। पुरुषसिंह! वहाँ स्नान करनेसे अश्वमेधयज्ञके फलकी प्राप्ति होती है ॥ ७४ ॥ गत्वा यत्र महाप्राज्ञ विष्णुना प्रभविष्णुना ।